इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि चेक की वैधता समाप्त होने के बाद उसके अनादर पर परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के तहत कोई आपराधिक केस नहीं चलाया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने श्रीमती अर्चना सिंह गौतम की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
महत्वपूर्ण घटनाक्रम:
विलय और वैधता समाप्ति: 30 सितंबर 2021 को इलाहाबाद बैंक का विलय इंडियन बैंक में कर दिया गया था और इस संबंध में सामान्य सूचना जारी की गई थी कि इस तारीख के बाद इलाहाबाद बैंक के चेक अमान्य हो जाएंगे।
चेक प्रस्तुत करने की समय सीमा: कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि चेक को उसकी वैधता अवधि के दौरान ही बैंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। वैधता समाप्ति के बाद पेश किए गए चेक पर धारा 138 लागू नहीं होती है।
अधीनस्थ अदालत की कार्यवाही रद्द: इस मामले में कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत द्वारा जारी समन सहित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।
याचिका का मामला:
श्रीमती अर्चना सिंह गौतम ने याचिका दायर की थी जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने बृजेश कुमार सिंह को इलाहाबाद बैंक का एक चेक दिया था। जब यह चेक वैधता अवधि समाप्त होने के बाद प्रस्तुत किया गया तो वह अनादृत हो गया। इसके बाद बांदा के कोतवाली नगर में एफआईआर दर्ज की गई थी और न्यायिक मजिस्ट्रेट बांदा ने सम्मन जारी कर दिया था। इस सम्मन आदेश और केस कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
कोर्ट का निष्कर्ष:
अमान्य चेक पर धारा 138 की देयता नहीं: कोर्ट ने कहा कि यदि कोई अमान्य चेक बैंक के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और उसका अनादर होता है, तो धारा 138 एन.आई. एक्ट के तहत कोई देयता नहीं बनती है। इलाहाबाद बैंक का चेक इंडियन बैंक में उसके विलय के बाद अमान्य हो गया है।
सूचना का प्रकाशन: 2020 में इलाहाबाद बैंक के इंडियन बैंक में विलय के बाद इंडियन बैंक द्वारा समाचार पत्रों में व्यापक परिपत्र जारी किया गया था जिसमें इस तथ्य का उल्लेख किया गया था कि इलाहाबाद बैंक द्वारा जारी सभी चेक इंडियन बैंक के चेक के साथ बदले जा सकते हैं और इलाहाबाद बैंक के चेक 30 सितंबर 2021 तक ही मान्य होंगे।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि चेक की वैधता समाप्त होने के बाद उसके अनादर पर आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है। यह निर्णय न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण योगदान देगा।
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