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लखनऊ का दर्दनाक हादसा: ऑनलाइन गेमिंग की लत ने ली 14 वर्षीय मासूम की जान

लखनऊ का दर्दनाक हादसा: ऑनलाइन गेमिंग की लत ने ली 14 वर्षीय मासूम की जान

ब्रेकिंग न्यूज

  •  17 Sep 2025
  •  शिवंलेख
  •  9 Min Read
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लखनऊ : आज के दौर में मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन गए हैं। लेकिन जब यही शौक धीरे-धीरे लत में बदल जाए, तो यह परिवारों को तोड़कर रख देता है। राजधानी लखनऊ से सामने आया एक मामला इस सच को और भी डरावना बना देता है। मोहनलालगंज इलाके में 14 वर्षीय बच्चे ने ऑनलाइन गेमिंग की लत में अपने पिता के बैंक खाते से करीब 13 लाख रुपये गवां दिए। जब सच सामने आया तो उसने आत्महत्या कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली।

यह कहानी केवल एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि समाज के सामने खड़ा होता बड़ा सवाल है – बच्चों पर ऑनलाइन गेमिंग के बढ़ते खतरों को कब और कैसे रोका जाएगा?

पीड़ित परिवार का इकलौता बेटा था यश यादव, जो कि छठी कक्षा का छात्र था। पिता सुरेश यादव मजदूरी करके परिवार का पेट पालते थे। दो साल पहले उन्होंने पुश्तैनी जमीन बेचकर घर बनाने और भविष्य सुरक्षित करने के लिए करीब 13 लाख रुपये बैंक खाते में जमा किए थे। यह रकम उनके परिवार के लिए उम्मीद और सुरक्षा का सहारा थी।

लेकिन यश को फोन के जरिए एक नया नशा मिल गया – फ्री फायर जैसे ऑनलाइन गेम्स। वह पिता का मोबाइल इस्तेमाल करता था और धीरे-धीरे गेम की दुनिया में डूबता चला गया। पिता की बैंक अकाउंट से लिंक्ड मोबाइल नंबर के जरिए उसने पेमेंट मोड एक्टिवेट किया और खेल-खेल में लाखों रुपये खर्च कर डाले।

सुरेश यादव को इसका अहसास तब हुआ जब वे इलाज के लिए बैंक से पैसे निकालने पहुंचे। काउंटर पर पता चला कि उनके खाते में एक भी रुपया नहीं बचा है। कर्मचारी ने जानकारी दी कि पैसे लगातार ऑनलाइन गेमिंग ट्रांजेक्शन में चले गए।

हैरान-परेशान सुरेश घर लौटे और बेटे से बात करने की कोशिश की। लेकिन यश ने कुछ नहीं बताया। कुछ ही देर बाद वह दूसरे कमरे में गया और फांसी लगाकर जान दे दी

यह घटना पूरे मोहल्ले को हिलाकर रख देने वाली थी। जमीन बेचकर जमा की गई मेहनत की गाढ़ी कमाई और उससे बड़ा – परिवार का इकलौता बेटा – दोनों एक झटके में खत्म हो गए।

यश की मां ने बताया कि वे अक्सर उसे फोन पर ज्यादा समय बिताने के लिए डांटती थीं। लेकिन हर बार बेटा यही कहकर टाल देता कि वह कार्टून देख रहा है। परिवार को अंदाजा भी नहीं था कि उनका बच्चा धीरे-धीरे गेमिंग की लत में डूब रहा है और इतनी बड़ी रकम दांव पर लगा चुका है।

यश का यह राज तब तक छिपा रहा जब तक सब कुछ खत्म नहीं हो गया।

यह पहला मामला नहीं है। महज़ कुछ हफ्ते पहले, 22 अगस्त को, लखनऊ में पढ़ाई कर रहे आजमगढ़ के 18 वर्षीय सिद्धार्थ ने भी आत्महत्या कर ली थी। उसने सुसाइड नोट में साफ लिखा था कि ऑनलाइन गेम्स की लत ने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी है और परिवार को दुखी कर रखा है।

लगातार सामने आ रहे ये मामले बताते हैं कि ऑनलाइन गेमिंग केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया, बल्कि बच्चों और युवाओं की मानसिकता पर गंभीर असर डाल रहा है।

भारत में ऑनलाइन गेमिंग का मार्केट लगभग 3.7 अरब डॉलर का है। आंकड़े बताते हैं कि करीब 45 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में इससे प्रभावित हुए हैं। कई घरों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी, लोग कर्ज में डूबे और मानसिक बीमारियों से जूझने लगे।

खासकर रियल मनी गेम्स यानी ऐसे गेम, जिनमें असली पैसे से खेला जाता है, कई परिवारों की बर्बादी का कारण बने। इन्हीं खतरों को देखते हुए सरकार ने पिछले महीने बेटिंग और रियल मनी गेम्स पर स्थायी पाबंदी लगाई थी।

नए कानून के तहत:

  • कोई भी कंपनी अगर मनी-बेस्ड गेम ऑफर करती है, चलाती है या उसका प्रचार करती है तो उसे 3 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये का जुर्माना हो सकता है।
  • विज्ञापन चलाने वालों पर भी 2 साल तक की सजा और लाखों का जुर्माना तय किया गया है।
  • अब तक सरकार 1500 से अधिक वेबसाइट्स और मोबाइल ऐप्स ब्लॉक कर चुकी है।

हालांकि प्रतिबंध रियल मनी गेम्स पर लगाया गया है, लेकिन समस्या यह है कि कई गेम सीधे पैसे नहीं मांगते। वे इन-ऐप पर्चेस यानी गेम के अंदर सामान खरीदवाने या दूसरे इनडायरेक्ट तरीकों से पैसे वसूलते हैं।

फ्री फायर जैसा गेम, जिसमें यश ने लाखों रुपये गंवाए, इसी श्रेणी का है। कंपनियां नए-नए रास्ते निकालती हैं ताकि कानून को चकमा देकर लोगों से पैसे ऐंठ सकें।

यश की मौत एक चेतावनी है कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है।

  • परिवारों को जागरूक होना होगा कि बच्चे फोन पर कितना समय बिताते हैं और किस चीज़ में लगे हैं।
  • स्कूलों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी, ताकि बच्चों को टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल सिखाया जा सके।
  • और सबसे बड़ी जिम्मेदारी एजेंसियों की है, जो यह सुनिश्चित करें कि कोई भी कंपनी बच्चों को गुमराह कर उनसे पैसा न ऐंठ सके।

लखनऊ का यह दर्दनाक हादसा हमें याद दिलाता है कि डिजिटल युग की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगर सरकार का नया कानून कुछ महीने पहले लागू हो जाता, तो शायद 14 साल का यश आज जिंदा होता।

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