लद्दाख की बर्फ़ीली चोटियों से उठी एक आवाज़ आज जोधपुर सेंट्रल जेल की दीवारों के भीतर गूंज रही है। यह आवाज़ है शिक्षा सुधारक, पर्यावरणविद और गांधीवादी आंदोलनकारी सोनम वांगचुक की — वही शख्स जिन पर आज देशभर में नज़रें टिकी हैं।
“जब तक लद्दाख में मारे गए चार लोगों की मौत की स्वतंत्र न्यायिक जांच नहीं हो जाती, मैं जेल से बाहर नहीं आऊंगा।”
यह बयान वांगचुक ने जेल से भेजे एक लिखित संदेश में दिया है। एक ऐसा संदेश जो न केवल उनके समर्थकों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रतीक बन गया है — शांतिपूर्ण प्रतिरोध का, न्याय के प्रति अडिग संकल्प का।
सितंबर के महीने में लद्दाख में हुए विरोध प्रदर्शनों ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। स्थानीय संगठनों — एपेक्स बॉडी लेह और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) — की अगुवाई में हजारों लोग सड़कों पर उतरे थे। उनकी मांगें स्पष्ट थीं:
लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन तब हिंसक मोड़ ले बैठा जब पुलिस ने भीड़ पर फायरिंग कर दी। चार निर्दोष नागरिकों की मौत हो गई, कई घायल हुए, और लद्दाख का शांत इलाका गुस्से में सुलग उठा।
इसी तनावपूर्ण माहौल में सरकार ने सोनम वांगचुक पर भीड़ को “उकसाने” का आरोप लगाया और उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई कर दी।
इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया — सैकड़ों किलोमीटर दूर, अपने घर से, अपनी भूमि से, अपनी जनता से दूर।
बीते शुक्रवार को सोनम वांगचुक के वकील मुस्तफा हाजी और उनके बड़े भाई कातसेन दरजे उनसे मिलने जेल पहुंचे। इसी मुलाकात के दौरान वांगचुक ने अपना यह भावनात्मक संदेश लिखा — जिसे उन्होंने अपने समर्थकों से पूरे देश तक पहुंचाने की अपील की।
उन्होंने कहा,
“मैं शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह ठीक हूं। सबके प्यार, दुआओं और चिंता के लिए दिल से शुक्रिया। लेकिन जब तक लद्दाख में मारे गए हमारे चार साथियों की मौत की स्वतंत्र न्यायिक जांच नहीं होती, मैं जेल से बाहर नहीं आऊंगा।”
वांगचुक ने अपने संदेश में उन परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की जिनके प्रियजन इस हिंसा में मारे गए। उन्होंने लिखा,
“जिन लोगों ने अपने परिजन खोए हैं, उनके प्रति मेरी गहरी संवेदना। घायल और गिरफ्तार लोगों के लिए मेरी दुआएं हैं।”
उन्होंने एक बार फिर यह दोहराया कि लद्दाख में हुई फायरिंग की जांच एक स्वतंत्र न्यायिक समिति से कराई जानी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और न्याय सुनिश्चित हो सके।
वांगचुक का संदेश सिर्फ एक भावनात्मक अपील नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक घोषणा भी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह एपेक्स बॉडी लेह और KDA की मांगों के साथ हैं।
“लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत अधिकार और स्टेटहुड मिलना चाहिए। मैं एपेक्स बॉडी के हर कदम के साथ हूं।”
साथ ही उन्होंने अपने समर्थकों से शांति और अहिंसा बनाए रखने की अपील की —
“मैं सभी से अपील करता हूं कि शांति और एकता बनाए रखें। हमारा संघर्ष गांधीजी के अहिंसक रास्ते पर जारी रहना चाहिए।”
उनकी यह पंक्तियाँ जेल की ऊँची दीवारों से निकलकर लद्दाख की घाटियों में गूंज उठीं।
वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद केंद्र सरकार पर कई सवाल उठे। विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कार्रवाई को “लोकतांत्रिक विरोध की आवाज़ दबाने” की कोशिश बताया।
वहीं, पुलिस ने दावा किया कि सोनम वांगचुक “भीड़ को भड़काने” में शामिल थे और यहां तक कि उनका “पाकिस्तान कनेक्शन” होने का भी आरोप लगाया गया।
इसके अलावा, केंद्र सरकार ने वांगचुक की एनजीओ का एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) लाइसेंस भी रद्द कर दिया — जिससे उनकी संस्था विदेशी फंडिंग प्राप्त नहीं कर सकेगी।
अब इस पूरे मामले की जांच सीबीआई कर रही है।
सोनम की पत्नी गीतांजलि आंगवो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने अपने पति की गिरफ्तारी को “मनमाना और असंवैधानिक” बताया है।
गीतांजलि का कहना है कि सोनम न केवल लद्दाख बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं।
उन्होंने कहा,
“एक शांतिपूर्ण व्यक्ति, जिसने अपना जीवन शिक्षा और जलवायु सुधार को समर्पित किया, उसे आतंकियों की तरह जेल में डाल देना लोकतंत्र पर धब्बा है।”
सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले पर सुनवाई होनी बाकी है।
सोनम वांगचुक का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं।
‘थ्री इडियट्स’ फिल्म के किरदार फुनसुख वांगडू का प्रेरणास्रोत माने जाने वाले सोनम ने लद्दाख में शिक्षा और पर्यावरण सुधार के लिए जीवन समर्पित किया है।
उनका “आईस स्तूपा प्रोजेक्ट” और SECMOL संस्थान आज वैश्विक स्तर पर सराहे जाते हैं।
लेकिन आज वही व्यक्ति जेल की सलाखों के पीछे है — अपने ही देश में, अपने ही लोगों के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में।
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