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सरकार ने सिविल स्कोर को लेकर बड़ा फैसला लिया, अब खराब स्कोर वालों को भी मिलेगा मौका

सरकार ने सिविल स्कोर को लेकर बड़ा फैसला लिया, अब खराब स्कोर वालों को भी मिलेगा मौका

ब्रेकिंग न्यूज

  •  29 Aug 2025
  •  शिवंलेख
  •  11 Min Read
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नई दिल्ली। घर खरीदने का सपना, अपनी पहली कार लेना या अचानक जरूरत पड़ने पर पर्सनल लोन लेना—इन सबके बीच सबसे बड़ी बाधा हमेशा एक ही रही है: सिविल स्कोर (CIBIL Score)। अक्सर लोगों को बैंक या वित्तीय संस्थान से यह जवाब मिलता था कि “आपका स्कोर खराब है, इसलिए लोन नहीं मिल सकता।” लेकिन अब सरकार ने इस पूरे नियम को लचीला बना दिया है। संसद में ऐलान हुआ है कि केवल सिविल स्कोर खराब होने के आधार पर बैंक अब किसी को भी लोन देने से मना नहीं कर पाएंगे।

यह फैसला करोड़ों भारतीयों के लिए बड़ी राहत की खबर है, खासकर उन लोगों के लिए जो पहली बार लोन लेने जा रहे हैं या जिनकी पिछली वित्तीय परिस्थितियों के कारण स्कोर अच्छा नहीं रहा।

अब सिविल स्कोर नहीं होगा ‘एकमात्र कसौटी’

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने कभी भी किसी न्यूनतम सिविल स्कोर को लोन के लिए जरूरी शर्त नहीं बनाया है। इसका सीधा मतलब है कि अब बैंक केवल इस आधार पर लोन एप्लीकेशन को रिजेक्ट नहीं कर सकते कि आवेदक का स्कोर कम है या स्कोर ही मौजूद नहीं है।

पहली बार लोन लेने वाले लाखों युवाओं के लिए यह खबर खास मायने रखती है। अब उन्हें यह चिंता नहीं रहेगी कि बिना क्रेडिट हिस्ट्री के बैंक उनकी एप्लीकेशन खारिज कर देंगे।

आखिर क्या होता है सिविल स्कोर?

सिविल स्कोर दरअसल क्रेडिट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (CIR) का हिस्सा है, जो यह बताता है कि किसी व्यक्ति ने पहले कितने लोन लिए, कितनी ईएमआई समय पर भरी और कितनी बार पेमेंट डिफॉल्ट हुआ।

  • स्कोर 300 से 900 के बीच होता है।
  • 900 के करीब स्कोर का मतलब है कि व्यक्ति विश्वसनीय है और लोन चुकाने में सक्षम है।
  • वहीं 600 से कम स्कोर को बैंकों के लिए जोखिम भरा माना जाता है।

भारत में यह रिपोर्ट क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियां तैयार करती हैं। सबसे लोकप्रिय नाम CIBIL है, जिसके चलते लोग क्रेडिट स्कोर को ही आम बोलचाल में “सिविल” कहने लगे। इसके अलावा Experian, Equifax और CRIF Highmark भी ऐसी मान्यता प्राप्त कंपनियां हैं।

सिविल स्कोर का असर: ब्याज दर और लोन अप्रूवल पर

बाजार में प्रचलित मानकों के मुताबिक, स्कोर की कैटेगरी इस प्रकार मानी जाती है:

  • 300 से 680: खराब स्कोर, अक्सर डिले या डिफॉल्ट के कारण।
  • 681 से 730: औसत स्कोर, लोन मिल सकता है लेकिन रिस्क ज्यादा माना जाता है।
  • 731 से 770: अच्छा स्कोर, हालांकि ब्याज दर थोड़ी ऊंची हो सकती है।
  • 771 से 790: बहुत अच्छा स्कोर, लोन आसानी से मंजूर हो जाता है।
  • 791 से 900: बेहतरीन स्कोर, बैंक खुद लोन देने को तैयार रहते हैं और ब्याज दर पर बारगेनिंग भी संभव होती है।

यही कारण है कि अब तक खराब स्कोर वाले लोगों को लोन पाना मुश्किल होता था।

क्यों जरूरी था यह बदलाव?

भारत में करीब 60 करोड़ लोगों और सवा 5 करोड़ बिजनेस की क्रेडिट हिस्ट्री दर्ज है। लेकिन इनमें से करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी लोन नहीं लिया, और उनके पास कोई स्कोर ही नहीं है।

ऐसे लोग पहली बार जब लोन के लिए आवेदन करते हैं, तो बैंक उनका एप्लीकेशन केवल इस आधार पर खारिज कर देते थे कि उनके पास कोई क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं है। यह व्यवस्था आम लोगों के लिए हतोत्साहित करने वाली थी।

सरकार चाहती है कि:

  1. अधिक से अधिक लोगों को औपचारिक बैंकिंग सिस्टम में लाया जाए।
  2. पहली बार लोन लेने वालों को मौका मिले।
  3. क्रेडिट मार्केट को मजबूत किया जाए।

क्या अब हर किसी को मिलेगा लोन?

सरकार ने साफ किया है कि यह फैसला “ओपन इनविटेशन” नहीं है। यानी यह नहीं कि हर व्यक्ति लोन मांगे और तुरंत मंजूर हो जाए।

बैंक अभी भी कुछ अन्य फैक्टर्स पर ध्यान देंगे, जैसे:

  • आवेदक की इनकम और जॉब प्रोफाइल
  • पिछले लोन का रिकॉर्ड और सेटलमेंट हिस्ट्री
  • कहीं रिस्ट्रक्चरिंग या डिले पेमेंट तो नहीं हुआ
  • और समग्र वित्तीय स्थिरता

लेकिन इतना तय है कि केवल खराब सिविल स्कोर या स्कोर न होने के कारण अब किसी को लोन से वंचित नहीं किया जाएगा।

आम लोगों के लिए फायदे

इस फैसले से कई वर्ग सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे:

  1. युवा और पहली बार लोन लेने वाले – उन्हें अब स्कोर की चिंता किए बिना होम लोन, एजुकेशन लोन या पर्सनल लोन के लिए आवेदन करने का अवसर मिलेगा।
  2. गांव और छोटे शहरों के लोग – जहां औपचारिक बैंकिंग की पहुंच अभी भी सीमित है।
  3. छोटे व्यापारी और स्वरोजगार करने वाले – जिनकी आय स्थिर नहीं होती और जिनका स्कोर अक्सर औसत या खराब होता है।
  4. पिछले डिफॉल्ट करने वाले लोग – जिन्हें दोबारा मौका मिल सकेगा कि वे सुधार कर अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करें।

बैंकिंग सेक्टर के लिए चुनौतियां

जहां यह कदम लोगों के लिए राहत है, वहीं बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए नई चुनौती भी है। पहले बैंक सिविल स्कोर को एक आसान और स्पष्ट पैमाना मानते थे। अब उन्हें आवेदकों की क्रेडिट योग्यता का आकलन करने के लिए नई रणनीतियां और जोखिम मूल्यांकन के तरीके अपनाने होंगे।

संभावना है कि बैंक:

  • इनकम टैक्स रिटर्न, सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट जैसी जानकारियों पर ज्यादा निर्भर करेंगे।
  • आवेदकों की डिजिटल ट्रांजैक्शन हिस्ट्री (UPI, कार्ड पेमेंट, ऑनलाइन ट्रांजैक्शन) को भी अहम मानेंगे।
  • अधिक सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से कोलेटरल या गारंटी की मांग कर सकते हैं।

सालाना मुफ्त क्रेडिट रिपोर्ट का नियम

इससे पहले इस साल एक और बड़ा फैसला हुआ था। अब हर व्यक्ति को साल में एक बार मुफ्त क्रेडिट रिपोर्ट और स्कोर ईमेल पर मिलेगा। बाकी बार स्कोर जानने के लिए कंपनियां 100 रुपये शुल्क लेती हैं।

इससे लोगों को अपनी क्रेडिट हिस्ट्री को समझने और समय रहते सुधारने का अवसर मिलेगा।

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह फैसला क्रेडिट लोकतंत्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम है।

  • इससे क्रेडिट मार्केट का विस्तार होगा।
  • छोटे उद्यमियों को विकास के अवसर मिलेंगे।
  • और आम लोगों के बीच बैंकिंग सिस्टम पर विश्वास बढ़ेगा।

हालांकि, यह भी चेतावनी दी जा रही है कि अगर बैंक रिस्क मैनेजमेंट में सावधानी नहीं बरतते तो NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) बढ़ने का खतरा रहेगा। सरकार का यह फैसला उन करोड़ों भारतीयों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनका सपना है कि वे अपना घर बनाएं, कार खरीदें या बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन लें। सिविल स्कोर अब लोन का ‘गेटकीपर’ नहीं रहेगा, लेकिन जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है—आवेदक की ओर से भी और बैंकों की ओर से भी। जैसा कि वित्त मंत्री पंकज चौधरी ने कहा, “बैंकों को केवल सिविल स्कोर देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। उन्हें संपूर्ण वित्तीय स्थिति देखकर निर्णय लेना होगा।” अब सवाल यह है कि इस बदलाव से कितने लोग अपने सपनों को पंख दे पाएंगे और बैंक किस तरह इस नए दौर में जोखिम और अवसर के बीच संतुलन बना पाएंगे।

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