कोर्ट के 1 सितंबर के फैसले के खिलाफ यूपी और तमिलनाडु सरकारों समेत शिक्षक संगठनों ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका, योगी सरकार ने कहा—सेवानिवृत्ति के मुहाने पर खड़े शिक्षकों से परीक्षा पास कराने का फैसला व्यावहारिक नहीं
उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की दुनिया इन दिनों उथल-पुथल से गुजर रही है। वजह है सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश, जिसने लाखों सरकारी शिक्षकों के प्रमोशन और भविष्य को सवालों के घेरे में ला दिया है। आदेश यह कहता है कि पहली से आठवीं कक्षा तक के सभी सरकारी शिक्षक — अगर वे प्रमोशन चाहते हैं — तो उन्हें टीईटी (Teacher Eligibility Test) पास करना अनिवार्य होगा।
यह आदेश 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया था, जिसके बाद से न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि देश के कई राज्यों में शिक्षकों के बीच असंतोष फैल गया। जगह-जगह धरने हुए, ज्ञापन सौंपे गए, और सरकार से गुहार लगाई गई कि इस फैसले पर पुनर्विचार कराया जाए। आखिरकार योगी सरकार ने पहल की — और अब खबर यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल कर दी है।
1 सितंबर को आए इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “देश की नई पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए शिक्षकों की बुनियाद मजबूत होनी चाहिए। शिक्षक खुद को लगातार अपडेट रखें, नई तकनीकों और शिक्षा के नए तरीकों को अपनाएं — इसके लिए उन्हें टीईटी परीक्षा पास करना जरूरी होगा।”
कोर्ट का तर्क यह था कि शिक्षा की गुणवत्ता तभी सुधरेगी जब शिक्षक स्वयं योग्यता के उच्च मानक बनाए रखेंगे। इसलिए, अदालत ने आदेश दिया कि —
इस आदेश से सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश के लाखों सरकारी शिक्षक प्रभावित हुए हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जो दशकों से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, और अब सेवानिवृत्ति के करीब हैं।
सरकार और शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह आदेश “व्यावहारिक रूप से असंभव” है। शिक्षक संघों के मुताबिक, जिन शिक्षकों ने 25-30 साल पहले प्रशिक्षण और नियुक्ति पाई, उन्हें अब जीवन के अंतिम चरण में नई परीक्षा देना मजबूरी बन जाएगी।
ऑल इंडिया प्राइमरी टीचर्स फेडरेशन के महासचिवों ने कहा —
“हम गुणवत्ता शिक्षा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन 55-60 वर्ष की उम्र में बैठे शिक्षक के लिए अचानक टीईटी जैसी परीक्षा पास करना न केवल मानसिक दबाव है बल्कि असंवेदनशील कदम भी है। कोर्ट को यह समझना चाहिए कि यह शिक्षक 30 साल से पढ़ा रहे हैं, वे किसी योग्यता की कमी से नहीं, बल्कि अनुभव की ऊँचाई पर हैं।”
उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करते हुए कहा है कि यह आदेश केवल उन शिक्षकों पर लागू होना चाहिए जिनकी नियुक्ति Right to Education (RTE) Act लागू होने के बाद हुई है।
योगी सरकार की ओर से कहा गया —
“आरटीई से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना न्यायोचित नहीं है। उन्होंने उस समय के नियमों के अनुसार नौकरी पाई थी। अब उनसे नई योग्यता की मांग करना अनुचित है।”
तमिलनाडु सरकार ने भी इस आदेश के खिलाफ समान दलील देते हुए पुनर्विचार का आग्रह किया है। इन दोनों सरकारों का कहना है कि कोर्ट के आदेश का प्रभाव न केवल शिक्षकों के प्रमोशन पर पड़ेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भी असंतुलन पैदा करेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों में शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किए। कुछ जिलों में शिक्षकों ने ज्ञापन सौंपकर मांग की कि सरकार कोर्ट में जाकर उनकी ओर से पक्ष रखे।
लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर और कानपुर जैसे शहरों में शिक्षकों के संगठनों ने सामूहिक बैठकें कीं। उनका कहना था कि कोर्ट के आदेश से शिक्षक समुदाय “अपमानित” महसूस कर रहा है।
एक शिक्षक नेता ने कहा —
“हम शिक्षा सुधार के पक्ष में हैं, लेकिन सुधार का मतलब अपमान नहीं होना चाहिए। जो लोग जीवनभर बच्चों को पढ़ाते रहे, अब उनसे कहना कि ‘तुम अयोग्य हो जब तक टीईटी पास न करो’, यह अन्याय है।”
शिक्षकों के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया कि राज्य सरकार शिक्षकों के पक्ष में है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समीक्षा के लिए रिवीजन पेटिशन दाखिल कर दी गई है।
योगी ने कहा —
“हम अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कानूनी समीक्षा कराई जा रही है। जिन शिक्षकों ने दशकों तक सेवा की है, उनके हितों की रक्षा की जाएगी।”
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं में से केवल 0.01% ही स्वीकार की जाती हैं। यानी, 99.99% मामलों में कोर्ट अपने पुराने आदेश में बदलाव नहीं करता।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यूपी और तमिलनाडु सरकारों की गुहार से सुप्रीम कोर्ट अपने 1 सितंबर के आदेश पर पुनर्विचार करता है या नहीं।
टीईटी परीक्षा को भारत में शिक्षण गुणवत्ता के राष्ट्रीय मानक के रूप में देखा जाता है। यह परीक्षा केंद्र सरकार द्वारा सीटीईटी (CTET) और राज्य सरकारों द्वारा एसटीईटी (STET) के रूप में आयोजित की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर पढ़ाने वाले शिक्षक आवश्यक योग्यता और शिक्षण कौशल रखते हों।
हालांकि, शिक्षकों का कहना है कि यह परीक्षा नए उम्मीदवारों के लिए ठीक है, लेकिन पुराने शिक्षकों के लिए इसे “अनिवार्य” बनाना व्यावहारिक रूप से गलत है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की तारीख जल्द तय होने की संभावना है। फिलहाल शिक्षक समुदाय, राज्य सरकारें और शिक्षा मंत्रालय सभी इस फैसले की दिशा पर नजरें गड़ाए बैठे हैं।
अगर कोर्ट अपने आदेश पर कायम रहता है, तो आने वाले दो वर्षों में देशभर के लाखों शिक्षकों को टीईटी पास करना होगा — वरना प्रमोशन और कई मामलों में भविष्य की नौकरी पर भी असर पड़ सकता है।
टीईटी की अनिवार्यता पर यह कानूनी जंग केवल परीक्षा या प्रमोशन की नहीं, बल्कि उस शिक्षक आत्मसम्मान की भी है जो दशकों से बच्चों को शिक्षित करता आया है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश पर अडिग रहता है या फिर सरकारों और शिक्षकों की दलील को “शिक्षा और संवेदना” के बीच संतुलन बनाते हुए कुछ राहत देता है।
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