पटना : लोक आस्था के महापर्व छठ की गूंज के बीच अब बिहार एक और बड़े उत्सव के लिए तैयार हो रहा है — लोकतंत्र के महापर्व यानी विधानसभा चुनाव के लिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पटना में दो दिवसीय दौरे के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में बिहार के मतदाताओं से भावनात्मक अपील करते हुए कहा —
“जिस तरह बिहारवासी छठ को पूरे उत्साह, अनुशासन और आस्था के साथ मनाते हैं, उसी भाव से चुनाव को भी लोकतंत्र का महापर्व मानकर मतदान करें।”
यह अपील सिर्फ औपचारिक नहीं थी। उनके स्वर में बिहार के प्रति गर्व, और लोकतंत्र के प्रति गहरी श्रद्धा झलक रही थी। उन्होंने कहा कि 17वीं विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर को समाप्त हो रहा है, इसलिए उससे पहले चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया संपन्न करनी होगी।
ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत भोजपुरी और मैथिली भाषाओं में की — यह इशारा था कि आयोग बिहार की आत्मा से जुड़कर संवाद करना चाहता है। उन्होंने राज्य के मतदाताओं को हाल ही में सम्पन्न एसआईआर (Special Summary Revision) अभियान को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि बिहार के मतदाताओं की सक्रियता पूरे देश के लिए प्रेरणा है।
“बिहार ने वैशाली से लोकतंत्र की परंपरा दी है, अब वही बिहार पूरे देश में नई दिशा दिखा रहा है,”
उन्होंने कहा।
प्रेस वार्ता में चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू, डॉ. विवेक जोशी, महानिदेशक (मीडिया) आशीष गोयल, बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विनोद सिंह गुंजियाल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने खुलासा किया कि इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में 17 नई पहलें लागू की जा रही हैं, जो पूरे देश के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगी। उन्होंने कहा कि बिहार प्रशासन की दक्षता और जनता की लोकतांत्रिक समझ ने आयोग को प्रयोग करने का आत्मविश्वास दिया है।
इन पहलों में बूथ स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने, मतदान प्रक्रिया को डिजिटल रूप से मजबूत करने, और मतदाताओं के अनुभव को अधिक सहज बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
ज्ञानेश कुमार ने एक अहम मुद्दे पर भी स्थिति स्पष्ट की —
“आधार कार्ड पहचान का प्रमाण हो सकता है, लेकिन नागरिकता का नहीं।”
इस बयान से कई तरह की अटकलों पर विराम लगा। आयोग ने साफ किया कि मतदान के लिए पहचान के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड मान्य रहेगा, लेकिन इसे नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना जाएगा।
आयोग ने बिहार के 90,712 बीएलओ (Booth Level Officers) की भूमिका की खुलकर प्रशंसा की।
ज्ञानेश कुमार ने कहा —
“बीएलओ ने जिस समर्पण और दक्षता से मतदाता सूची के शुद्धिकरण का काम किया है, वह पूरे देश के लिए मिसाल है। यह बिहार की प्रशासनिक क्षमता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।”
आयोग ने राजनीतिक दलों से भी सख्त अपील की है कि हर बूथ पर अपने एजेंट की मौजूदगी सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि मतदान की शुरुआत से लेकर फॉर्म 17C (मतदान की समाप्ति के बाद की रिपोर्ट) तक एजेंट का उपस्थित रहना पारदर्शिता के लिए जरूरी है।
ज्ञानेश कुमार ने बताया कि लंबी लाइनों से बचने के लिए प्रति बूथ मतदाताओं की अधिकतम संख्या 1200 तय की गई है। इससे मतदाताओं को सुविधा होगी और मतदान प्रतिशत में भी वृद्धि की उम्मीद है।
बिहार के राजनीतिक गलियारों में अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या चुनाव छठ महापर्व के आसपास होंगे। कई राजनीतिक दलों का मानना है कि अगर चुनाव छठ के बाद या उसके आसपास कराए जाएं तो प्रवासी बिहारी, जो पूजा के लिए घर लौटते हैं, वे भी मतदान में हिस्सा ले सकेंगे।
यह तर्क भी दिया जा रहा है कि छठ जैसे धार्मिक पर्व के समय बिहार में सामाजिक समरसता और एकजुटता की भावना चरम पर होती है, जिससे मतदान का वातावरण और भी उत्साहपूर्ण बन सकता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त का बिहार दौरा गहन तैयारियों से भरा रहा। पहले दिन उन्होंने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, प्रमंडलीय आयुक्तों, आईजी-डीआईजी, जिला निर्वाचन पदाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों के साथ बैठक की।
दूसरे दिन प्रवर्तन एजेंसियों, सुरक्षा एजेंसियों और राज्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ विस्तृत विमर्श हुआ। इसके बाद बिहार के मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य की सुरक्षा और निष्पक्षता से जुड़ी तैयारियों पर चर्चा हुई।
इन बैठकों का उद्देश्य सिर्फ तकनीकी समीक्षा नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि बिहार में चुनाव विश्वास और पारदर्शिता का प्रतीक बने।
ज्ञानेश कुमार ने कहा कि बिहार केवल चुनाव कराने वाला राज्य नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की प्रयोगशाला है।
“यहां से जो भी पहल निकलेगी, वह आने वाले वर्षों में देश के अन्य राज्यों में लागू होगी।”
उनकी इस टिप्पणी से यह संकेत मिला कि आयोग बिहार चुनाव को एक मॉडल इलेक्शन के रूप में पेश करने की योजना में है — जहां तकनीक, पारदर्शिता और जन-भागीदारी तीनों का संतुलन दिखेगा।
जैसे ही शाम 4 बजे चुनाव की तारीखों की औपचारिक घोषणा होगी, बिहार का सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच जाएगा। एनडीए, महागठबंधन और छोटे क्षेत्रीय दलों ने अपनी रणनीतियों पर फाइनल चर्चा शुरू कर दी है। हर पार्टी अब “छठ बाद वोट” की रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है।
जनता की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि कितने चरणों में मतदान होगा और किन तारीखों पर बिहार की तकदीर तय होगी।
आखिर में, मुख्य चुनाव आयुक्त की अपील वही थी जो हर जिम्मेदार नागरिक के मन को छू जाती है —
“छठ की तरह मनाएं लोकतंत्र का पर्व। जो घर से निकलते हैं सूर्य को अर्घ्य देने, वही दिन निकालें मतदान करने के लिए।”
बिहार एक बार फिर लोकतंत्र की दिशा तय करने जा रहा है। सवाल तारीखों का नहीं, भरोसे का है — और वह भरोसा सिर्फ एक बटन दबाने से कायम होगा।
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