नई दिल्ली। लोकसभा और राज्यसभा में सोमवार का दिन जबरदस्त राजनीतिक टकराव और हंगामे से भरा रहा। संसद टीवी के फ्रेम में गृह मंत्री अमित शाह भाषण देते दिखे, लेकिन असल कहानी उस फ्रेम के बाहर चल रही थी—जहाँ सुरक्षा घेरे में खड़े सांसद, फटी हुई बिल की कॉपियाँ और गूंजती नारेबाजी संसद की मर्यादा को चुनौती दे रही थीं।
दिन की शुरुआत लोकसभा में सुबह 11 बजे हुई। विपक्ष ने बिहार एसआईआर मामले पर जोरदार हंगामा किया और सदन शुरू होते ही स्थगित करना पड़ा।
12 बजे दोबारा कार्यवाही शुरू हुई तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ऑनलाइन गेमिंग विनियमन बिल पेश किया। यह बिल स्किल-बेस्ड और चांस-बेस्ड, दोनों तरह के मनी गेम्स (जैसे ड्रीम 11, पोकर, रमी) को प्रतिबंधित करने और उनके प्रचार को गैरकानूनी बनाने का प्रावधान करता है।
लेकिन विपक्ष का हंगामा जारी रहा। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू भड़क गए और विपक्ष पर संसद की कार्यवाही ठप करने का आरोप लगाया।
दोपहर 2 बजे गृह मंत्री अमित शाह ने तीन बड़े बिल सदन में पेश किए:
इनमें सबसे अहम प्रावधान यह है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर अपराध में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहते हैं, तो 31वें दिन उन्हें पद से हटाना अनिवार्य होगा।
जैसे ही शाह ने बिल पेश किए, विपक्ष ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया।
सबसे पहले एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी बोले। उन्होंने कहा:
“ये बिल निर्वाचित सरकारों पर ठोकी गई कील हैं। इससे भारत पुलिस स्टेट बन जाएगा। इसे विपक्षी राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।”
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने बिल को संविधान विरोधी बताते हुए कहा:
“हमारे न्यायशास्त्र की बुनियाद है कि इंसान तब तक निर्दोष है जब तक उसका गुनाह साबित न हो। यह बिल उस सिद्धांत को उलट देता है। इससे जांच अधिकारी भी प्रधानमंत्री से ऊपर हो जाएगा।”
केरल के सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन और टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने भी जोरदार विरोध किया।
बहस के बीच कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने अमित शाह पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि गुजरात के गृह मंत्री रहते हुए शाह खुद गिरफ्तार हुए थे।
इस पर शाह ने जवाब दिया:
“मैं जब झूठे मामले में जेल गया था, तो नैतिकता के आधार पर पद से इस्तीफा दिया था। हम ऐसे निर्लज्ज नहीं हैं कि आरोप लगने पर भी पद पर बने रहें। मैंने इस्तीफा देकर ही मर्यादा निभाई थी।”
विरोध के चरम पर विपक्षी सांसदों ने बिल की प्रतियां फाड़कर शाह की ओर उछाल दीं। माइक मोड़ने और खींचने की कोशिश की गई। हंगामा इतना बढ़ा कि सदन को बार-बार स्थगित करना पड़ा।
स्पीकर ओम बिरला ने नाराजगी जताई और कहा:
“देश की जनता देख रही है। विरोध करना है तो उचित तरीके से कीजिए, लेकिन यह तरीका संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाता है।”
राज्यसभा में भी विपक्ष ने बिहार एसआईआर के मुद्दे पर हंगामा किया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आईआईएम गुवाहाटी की स्थापना संबंधी बिल पेश किया, लेकिन विपक्षी सांसद वॉकआउट कर गए।
सरकार ने विपक्ष पर “देशहित की अनदेखी” का आरोप लगाया। इसके बाद बिल पर चर्चा हुई और ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।
संसद का पूरा दिन नारेबाजी, वॉकआउट और आरोप-प्रत्यारोप में बीता।
लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह सरकार विपक्षी सरकारों और नेताओं को निशाने पर लेने के लिए कानून बना रही है।
सोमवार का घटनाक्रम यह दिखाता है कि सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव किस हद तक बढ़ गया है। नैतिकता और मर्यादा की बातों के बीच बिलों की प्रतियां फाड़ना, नारेबाजी और वॉकआउट ने संसद की कार्यवाही को बार-बार बाधित किया।
अब सवाल यह है कि क्या संसद राजनीति की जंग का अखाड़ा बनती जा रही है, या फिर विपक्ष और सत्ता पक्ष लोकतंत्र की गरिमा को बचाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएंगे?
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