28 अगस्त को रक्षाबंधन है। हर बार की तरह इस बार भी टीवी और सामाजिक माध्यमों पर इस त्योहार से जुड़े तरह-तरह के विज्ञापन आ रहे हैं। ऐसा ही एक विज्ञापन आभूषण कंपनी जीवा ने भी बनाया। जिस पर अब भारी विवाद छिड़ गया है।
लोगों ने उस विज्ञापन में शामिल कृति सेनन के कपड़ों पर सवाल उठाए। एक तबके का कहना है कि कोई बहन इस तरह के कपड़े पहनकर अपने भाई को राखी क्यों बांध रही है? फिर इस विवाद में कंगना रनौत ने प्रवेश किया और कृति के कपड़ों को भद्दा बता दिया। अब इस विरोध पर कृति सेनन ने प्रतिक्रिया दी है और इस प्रतिक्रिया ने अप्रत्यक्ष रूप से कंगना को भी जवाब दिया है।
इंस्टाग्राम पर कृति ने एक कहानी पोस्ट की। इसमें उन्होंने लिखा, त्योहारों की असल बुनियाद कपड़ों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं और परंपराओं में होती है, जिन्हें हम दिल से निभाते हैं।
रक्षाबंधन रक्षा का बंधन है। मेरी बहन और मैं एक-दूसरे को राखी बांधते हैं क्योंकि हमें यकीन है कि हम एक-दूसरे की रक्षा किसी भाई से कम नहीं करेंगे। कृति ने कहा कि रक्षाबंधन पर लोग एक-दूसरे की अच्छी सेहत, खुशियों और लंबी उम्र की प्रार्थना करते हैं। इसमें उनके कुत्ते भी शामिल होते हैं क्योंकि वे भी परिवार का हिस्सा हैं।
फिर आलोचना करने वालों को जवाब देते हुए कृति आगे लिखती हैं, आखिर हम महिलाओं को यह बताना कब बंद करेंगे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए। समय के साथ पारंपरिक फैशन बदलता रहा है। लेकिन एक महिला का अपने संस्कृति के प्रति क्या सम्मान है, इसे सिर्फ उसके कपड़ों से आंका जाता है? संस्कृति और परंपरा औरतों के दिल में होती हैं, उनकी पोशाक की गले की कटावट में नहीं।
वैसे रक्षाबंधन के इस विवादित विज्ञापन में कृति ने भाई के अलावा पालतू कुत्ते को भी राखी बांधी थी। इस बात पर भी लोग हंगामा कर रहे हैं, मगर उतना नहीं जितना कृति के पहनावे को लेकर हुआ।
कंगना ने कृति के कपड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज का समय औरत होने के लिहाज से काफी शानदार है। आज महिलाओं की अलमारी में छोटी पोशाक से लेकर लहंगा-चोली, जींस, साड़ी, बिकनी और सलवार-कमीज तक हैं। उन्होंने कृति का नाम लिए बिना सवाल किया कि आखिर इतने विकल्प होने के बावजूद कोई बिकनी पहनकर अपने भाई को राखी क्यों बांध रहा है? यही नहीं, उन्होंने कृति के इस विज्ञापन को जानबूझकर भद्दा भी बताया।
कंट्रोवर्सी में हुई राहुल गांधी की एंट्री :
अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी कृति सनन की इस पोस्ट को अपनी Instagram स्टोरी पर रिशेयर किया है और कृति सनन का सपोर्ट किया है। राहुल गांधी ने महिलाओं की पसंद और आजादी को लेकर एक साफ संदेश दिया है। उन्होंने लिखा है
What a woman wears, what she does, and where she goes is her choice; stop trolling women for exercising their freedom.
मतलब राहुल का सीधा संदेश है कि महिला क्या पहनती है, क्या करती हैं और कहां जाती है यह उसकी अपनी पसंद है। अपनी आजादी का इस्तेमाल करने के लिए महिलाओं को ट्रोल करना बंद करिए
लेकिन कहानी सिर्फ यहां कृति सेनन के इस विज्ञापन तक ही सीमित नहीं है क्योंकि राहुल गांधी पिछले कुछ दिनों से महिलाओं की आजादी, उनकी हिस्सेदारी और पितृसत्ता के मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं। पुणे में हुए अपने महिला विशेष रैली कार्यक्रम में भी राहुल गांधी ने महिलाओं को लेकर पितृसत्ता को चुनौती देने की बात की थी। राहुल का तर्क है कि महिलाओं को सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि सत्ता और फैसले लेने में वास्तविक हिस्सेदारी चाहिए। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि महिलाओं को कितनी सीटें या कितने मौके मिल रहे हैं, बल्कि यह भी है कि फैसले लेने की ताकत उनके पास कितनी है?
अब इस विज्ञापन को लेकर भी बात कर लेते हैं कि जिस विज्ञापन को लेकर इतना बवाल हो रहा है, उसमें आखिर था क्या? यह करीब 35 सेकंड का एक वीडियो था। यह आभूषण ब्रांड जीवा का विज्ञापन था, जो 17 अगस्त को सामाजिक माध्यमों पर सामने आया था।
विज्ञापन में कृति सेनन रक्षाबंधन मनाती हुई नजर आती हैं। उन्होंने सफेद लहंगा और गहरी गले की ब्रैलेट शैली का ब्लाउज पहना है। वह अपने भाई को राखी बांधती हैं और अपने पालतू कुत्ते को भी राखी बांधती हुई दिखाई देती हैं।
इसके बाद सामाजिक माध्यमों पर इस विज्ञापन को लेकर तरह-तरह की आपत्तियां सामने आने लगीं। कुछ लोगों को कृति के कपड़ों पर आपत्ति थी तो कुछ लोगों ने कुत्ते को राखी बांधने वाले हिस्से पर सवाल उठा दिया। कृति ने बाद में इन आलोचनाओं का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि त्योहारों की खूबसूरती कपड़ों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं और परंपराओं में होती है, जिन्हें लोग अपने दिल में रखते हैं। इसे लेकर कृति ने इंस्टाग्राम पर एक कहानी डाली थी। उन्होंने यह भी लिखा था कि संस्कृति और परंपराओं को किसी महिला की गले की कटावट से नहीं आंका जाना चाहिए। और अब राहुल गांधी ने भी इसी पोस्ट को साझा कर दिया है।
लेकिन बीजेपी की तरफ से सवाल भी उठे। इस विवाद पर बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी बिना नाम लिए कृति के पहनावे पर सवाल उठाया था। कंगना ने भी बिल्कुल इसी तरह से अपने इंस्टाग्राम पर एक कहानी साझा की थी। उसमें कंगना ने कहा था कि आज का दिन यानी कि वह रक्षाबंधन को यहां संबोधित कर रही थीं। आज महिलाओं के पास पहनने के लिए इतने विकल्प हैं, साड़ी से लेकर लहंगा, जींस और सलवार-कमीज तक, तो फिर रक्षाबंधन जैसे त्योहार पर ऐसा पहनावा क्यों चुना गया?
यानी विवाद अब सिर्फ एक विज्ञापन का नहीं रह गया। एक तरफ कृति सेनन कह रही हैं कि महिलाओं को उनके कपड़ों के आधार पर आंकना बंद होना चाहिए। दूसरी तरफ कंगना जैसे नेता इस त्योहार, संस्कृति और पहनावे से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं। और इसी बीच राहुल गांधी इस बहस को महिलाओं की पसंद और आजादी के बड़े मुद्दे से जोड़ रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी का महिलाओं की पसंद और आजादी वाला संदेश इस तरह के विवादों के जरिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन रहा है? क्योंकि कृति सेनन का विज्ञापन तो करीब 35 सेकंड का था। लेकिन उसके बाद शुरू हुई बहस अब राजनीति तक पहुंच चुकी है।
सनातन धर्म के खिलाफ कथित दोहरे मानदंड पर बॉलीवुड से क्यों पूछे जा रहे सवाल?
बॉलीवुड में धार्मिक भावनाओं और सनातन धर्म से जुड़े विषयों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर फिल्मों, वेब सीरीज, विज्ञापनों और कलाकारों के बयानों को लेकर लोगों की आपत्तियां सामने आती रही हैं। आलोचकों का आरोप है कि मनोरंजन के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं, धार्मिक परंपराओं और सनातन संस्कृति को कई बार ऐसे तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिसे लोग अपमानजनक या मजाक उड़ाने वाला मानते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी दूसरे धर्म या समुदाय से जुड़े संवेदनशील विषयों को लेकर निर्माता और कलाकार सावधानी बरतते हैं, तो सनातन धर्म से जुड़े मामलों में वही संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई देती? क्या रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमा सभी धर्मों के लिए समान होनी चाहिए? यह बहस लगातार सामने आती रही है।
दूसरी ओर, ऐसे विवादों के बाद एक वर्ग यह तर्क देता है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि यही तर्क कई बार धार्मिक भावनाओं की अनदेखी को उचित ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर अक्सर वैचारिक ध्रुवीकरण भी देखने को मिलता है, जहां एक पक्ष कलाकारों की स्वतंत्रता का समर्थन करता है तो दूसरा पक्ष धार्मिक सम्मान और सांस्कृतिक संवेदनशीलता की मांग करता है।
'वामपंथी विचारधारा' से जुड़े लोगों और समूहों पर भी कभी-कभी ऐसे मामलों में एकतरफा समर्थन का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, किसी पूरे राजनीतिक या वैचारिक समूह को एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा। अलग-अलग लोग और संगठन इन विवादों पर अलग-अलग रुख रखते हैं। इसलिए बहस को आरोप-प्रत्यारोप के बजाय इस सवाल पर केंद्रित करना ज्यादा जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सनातन धर्म भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इससे जुड़े विषयों को प्रस्तुत करते समय रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी तरह दर्शकों की आलोचना और असहमति को भी लोकतांत्रिक तरीके से स्वीकार किया जाना चाहिए।
आखिरकार सवाल सिर्फ बॉलीवुड का नहीं, बल्कि दोहरे मानदंडों का है। अगर किसी भी धर्म या समुदाय की आस्था का मजाक उड़ाना गलत माना जाता है, तो यह सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। कला को सवाल पूछने और बहस पैदा करने की आजादी जरूर होनी चाहिए, लेकिन धार्मिक आस्था और संस्कृति के प्रति सम्मान भी उतना ही जरूरी है।