भारत की राजनीति में रोज नई पार्टियां बनती हैं। कोई चुनाव चिन्ह हाथी रखता है। कोई झाड़ू तो कोई कमर। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी पॉलिटिकल पार्टी के बारे में सुना है जिसके पास ना कोई झंडा है, ना कोई मेनिफेस्टो छापने वाला फंड और ना ही कोई ऐसा नेता जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में आकर माइक पर चिल्लाए। कॉकरोच जनता पार्टी के बाद अब एक नई पार्टी उतरी है। नाम है दिमागी नक्सल पार्टी। तरीका वही कॉकरोच पार्टी की तरह है। एक स्टेटमेंट से इसकी शुरुआत हुई है।
आखिर क्या है वो स्टेटमेंट?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से कहा था, “हथियार वाले नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा, आइसोलेट करना होगा और विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।”
बस यहीं से शब्द उठाकर बन गई दिमागी नक्सल पार्टी। जब यह वीडियो रिकॉर्ड किया जा रहा था, तब Instagram पर इस पार्टी के 2,36,000 फॉलोवर्स थे। वहीं Twitter यानी X पर 13,500 फॉलोवर्स थे।
यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी की तरह ही यह भी एक मूवमेंट है। आखिर Dimagi Naxal Party का लक्ष्य क्या है? इससे कौन से लोग जुड़ रहे हैं? इस पर बात करने से पहले यह जान लेते हैं कि Dimagi Naxals कौन हैं और यह शब्द किसके लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
जी हां, इंटरनेट पर इन दिनों एक नई पार्टी ने एंट्री मारी है जिसका नाम है दिमागी नक्सल पार्टी यानी कि डीएनजे। रातोंरात इस पार्टी के सोशल मीडिया पेज पर लाखों फॉलोवर्स जुड़ गए। एक वेबसाइट बन गई। एक मैनिफेस्टो आ गया। लेकिन जब सब ने पूछा कि अरे भाई इस पार्टी का नेशनल प्रेसिडेंट कौन है? तो जवाब मिला रहस्य।
आज हम इसी दिमागी नक्सल के पूरे केस की परतें उधेड़ेंगे।
तो चाय की चुस्की लीजिए और देखिए कि भारतीय राजनीति में जब शब्द फेंक कर मारे जाते हैं तो इंटरनेट कैसे उसका रायता फैलाता है।
पीएम मोदी की टिप्पणी को लेकर आरोप है कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले युवाओं के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया गया है। मसलन, सीजीपी के स्पोक्सपर्सन सौरव दास ने एक पोस्ट में लिखा कि युवा आपकी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। सिर्फ इसलिए आप पढ़े-लिखे नौजवानों पर यूं ही नक्सली होने का ठप्पा कैसे लगा सकते हैं?
कांग्रेस कह रही है कि पीएम ने अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए ऐसा कहा है।
प्रधानमंत्री लाल किले से दिमागी नक्सल की भाषा इस्तेमाल करते हैं अपने राजनीतिक विरोधियों को लेकर। आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने वीडियो शेयर कर कहा कि मैं दिमागी नक्सल हूं क्योंकि मैं देशभक्त हूं और मुझे इस पर गर्व है। वहीं कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने खुद को प्राउड दिमागी नक्सल बताया है।
बीजेपी की तरफ से इस पर क्लेरिफिकेशन आया है। राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने टीवी डिबेट में समझाया कि दिमागी नक्सल है कौन?
उन्होंने कहा कि 1.8 और 2% ग्रोथ रेट, जिसे हिंदू ग्रोथ रेट कहा जाता था, उसमें देश बड़ा सुंदर और सामंजस्यपूर्ण लगता था। 7.4% की दुनिया की फास्टेस्ट ग्रोथ रेट में उसे सामंजस्य नजर नहीं आता है, उसको दिमागी नक्सल कहा जाता है।
सीएए में जिसको यह नजर आता था कि ये नागरिकता लेने का कानून है। आज 5 साल लागू हो गए हैं। किसी मुस्लिम की नागरिकता नहीं गई। उसमें नक्सल उसके दिमाग को दिमागी नक्सल कहा जा सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि जिसको जय श्री राम में वॉर क्राई नजर आता हो, मगर सर तन से जुदा हो जाने के बाद भी उसमें सेक्युलर नजर आता हो, तो उसको दिमागी नक्सल कहा जाता है।
तो दिमागी नक्सल शब्द को लेकर ये तमाम रिएक्शंस हैं। सबकी अपनी-अपनी डेफिनेशंस हैं। अब इस शब्द से बनी पार्टी पर आते हैं।
दिमागी नक्सल पार्टी के क्या हैं मेनिफेस्टो?
वेबसाइट पर लिखा है—“दिमागी बनो, बेवकूफ नहीं।”
DNJP यानी Dimagi Naxal Janta Party ने अपने बारे में बताया कि ना तो हम कांग्रेस हैं, ना आम आदमी पार्टी, ना समाजवादी पार्टी और ना ही कोई Cockroach Janta Party। फिर भी इसे इन सभी के साथ चलने में कोई परहेज नहीं है। बस एक ही नियम है—सवाल पूछा जाए।
पार्टी का अपना एक मेनिफेस्टो भी है। इसमें छह नियम बताए गए हैं।
पहला: चाहे सरकार कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो, सवाल पूछा जाना चाहिए। बस यही इसका मकसद है।
दूसरा: हम आपसे अपनी पार्टी बदलने को नहीं कह रहे हैं। हम बस इतना कह रहे हैं कि हर तरह के सवाल पूछने वाले लोग एक-दूसरे को दुश्मन समझना बंद करें।
तीसरा: DNJP के पास ना कोई झंडा है, ना कोई तय फॉन्ट और ना ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाला कोई फाउंडर है। जिस आंदोलन को जिंदा रहने के लिए किसी स्पोक्सपर्सन की जरूरत पड़े, वो आंदोलन नहीं, महज एक बैठक है।
चौथा: आप इसे गाली की तरह इस्तेमाल करेंगे, हम दोपहर तक इसे अपना नारा बना लेंगे। अर्बन नक्सल भी कभी एक मजाक बन गया था। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है।
पांचवां: आपका हर क्लेरिफिकेशन इस मजाक को एक और हेडलाइन देगा। इसलिए क्लेरिफिकेशन देते रहिए।
छठा: मेंबरशिप की कोई फीस नहीं है। इससे जुड़ने की इकलौती शर्त है कि आपके पास एक चलता हुआ दिमाग हो और जोर से यह पूछने की हिम्मत हो—“लेकिन रुको, ऐसा क्यों?”
तो यह है Dimagi Naxal Janta Party (DNJP) का मेनिफेस्टो। बाकी इस मूवमेंट को लेकर आगे जो भी अपडेट्स हैं, वे सामने आते रहेंगे।
पीएम ने कहा कि जंगलों वाले हथियार बंद नक्सलवाद को तो हमने काफी हद तक खत्म कर दिया है। लेकिन समाज के भीतर यह दिमागी नक्सल अभी भी घूम रहे हैं जो देश को नुकसान पहुंचाते हैं।
अब नेताजी ने तो भाषण देश को जिताने के लिए दिया था। लेकिन हमारे देश का इंटरनेट। भाई साहब वो तो अलग ही दुनिया में जीता है। भाषण खत्म हुआ नहीं कि अगले दिन ही Instagram और एक्स पर एक अकाउंट प्रकट होता है दिमागी नक्सल पार्टी। और इस अकाउंट की पहली पंच लाइन क्या थी?
When someone says brainy naxal all I hear is intellectual baddie.
मतलब जो शब्द किसी को नीचा दिखाने या चेतावनी देने के लिए गढ़ा गया था इंटरनेट के जजी युवाओं ने उसे अपना नया कूल टैग बना लिया। लोग अपने नाम के आगे दिमागी नक्सल लिखने लगे और देखते ही देखते Instagram पर अकाउंट के ₹1.5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए।
अब आते हैं सबसे बड़े सस्पेंस पर। इस दिमागी नक्सल पार्टी का मालिक कौन है? क्या यह किसी राजनीतिक दल का आईटी सेल है? क्या यह किसी कॉलेज के खुराफाती छात्रों का ग्रुप है? या फिर किसी यूबर का नया स्टंट?
जब इस पार्टी की वेबसाइट खंगाली गई तो उनके मेनिफेस्टो में लिखा था हमारी पार्टी में जुड़ने के लिए कोई सदस्यता फीस नहीं चाहिए। बस दो शर्तें हैं।
पहला आपके पास एक काम करने वाला दिमाग होना चाहिए। और दूसरा आपके अंदर यह सवाल पूछने की हिम्मत होनी चाहिए कि रुकिए। पर ऐसा क्यों?
और तो और इस पार्टी का अपना एक एंथम भी है। जब लोगों ने एंथम वाले लिंक पर क्लिक किया तो वह सीधे 2006 की फिल्म रंगदेव बसंती के उस सीन पर ले गया जहां सरफरोशी की तमन्ना कविता बोली जाती है।
अब सोचिए ना कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस, ना कोई रैलियों में बांटे जाने वाले समोसे, ना गाड़ियों का काफिला और पार्टी हिट भी हो गई।
हालांकि मामला जब ज्यादा गर्म हुआ तो मीडिया में खबरें छपने लगीं तो अचानक से वह Instagram अकाउंट गायब भी हो गया। लेकिन रहस्य आज भी बरकरार है कि आखिर यह मास्टरमाइंड था कौन?
इंटरनेट तो मजे ही ले रहा था। हमारे असली वाले राजनेता कैसे पीछे रहते? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने तुरंत ट्वीट किया और खुद को प्राउड दिमागी नक्सल घोषित कर दिया।
अभिनेता प्रकाश राज ने रील बनाकर अपील की कि भाई बेवकूफ बनने से अच्छा है कि दिमागी बन जाओ।
मामला इतना बढ़ गया कि सरकार के मंत्री जी को मैदान में आना पड़ा। केंद्रीय मंत्री किरण रिजजू ने बाकायदा तीन पॉइंट में परिभाषा जारी की कि असली दिमागी नक्सल कौन होता है जो संविधान को ना माने जो देश को तोड़ने वालों के साथ खड़ा हो।
मतलब समझिए दिल्ली के दफ्तरों में बैठकर मंत्री जी परिभाषाएं तय कर रहे थे और उधर इंटरनेट पर 18 साल के बच्चे उसी नाम से मीम्स बनाकर हंस रहे थे।
दोस्तों इस पूरे दिमागी नक्सल पार्टी के पीछे चाहे कोई भी हो, चाहे वो कोई डिजिटल क्रिएटर हो, किसी विरोधी दल का खुराफाती दिमाग हो, इस घटना ने एक बात बहुत साफ कर दी है।
आजकल राजनीति में नेताओं को आदत हो गई है बड़े-बड़े भारी शब्द उछालकर एक दूसरे को एंटीनेशनल या फिर नक्सली बोलने की।
लेकिन आज की जनता अब इन भारीभरकम लेबल्स से डरती नहीं है। बल्कि वह इन लेबल्स को ही मीम बनाकर वापस नेताओं के मुंह पर मार देती है।
दिमागी नक्सल पार्टी का संस्थापक भले ही गुमनाम हो लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि इंटरनेट के दौर में अगर आप जनता को डराने के लिए कोई शब्द देंगे तो जनता उसका ट्रेंड बनाकर आपके ही मजे ले लेगी।