एक ऐसे जज जिनकी अदालत से पिछले कुछ महीनों में एक दो नहीं बल्कि 22 मृत्युदंड (Death Penalty) के फैसले आए। अब उनकी अदालत में लंबित करीब 100 मुकदमों को दूसरी अदालत में ट्रांसफर (Transfer) कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से न्यायिक व्यवस्था को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। मामला है अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की फास्ट ट्रैक (Fast Track) कोर्ट (Court) का। प्रशासनिक आदेश के बाद इन 22 मामलों को अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में भेज दिया गया है। और इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 100 गंभीर मामला (Case) एक साथ दूसरी अदालत में क्यों भेजे गए?
जानकारी के मुताबिक जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत में करीब 100 हत्या और गंभीर आपराधिक मामले लंबित थे। इन मामलों में ऐसे अपराध शामिल हैं जिनमें दोष साबित होने पर मृत्युदंड या फिर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। अब प्रशासनिक आदेश के जरिए इन मामलों को जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में वापस भेज दिया गया है। यानी जिन मामलों की सुनवाई अब तक एडीजी (ADG) रवि कुमार दिवाकर कर रहे थे उनकी सुनवाई आगे जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में होगी।
जज दिवाकर की अदालत पिछले कुछ महीनों से लगातार अपने सख्त फैसलों के कारण चर्चा में थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पिछले करीब 4 महीनों में उनकी अदालत ने 10 अलग-अलग आपराधिक मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। सबसे पहला 13 अगस्त की बात करें तो सबसे ताजा मामला 13 अगस्त का है। 12 साल पुराने हत्या के मामले में जज रवि कुमार दिवाकर ने रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार को मौत की सजा सुनाई।
मामला 2014 का था। आरोप था कि पुरानी रंजिश के चलते आरोपियों ने शामली जिले में पवन कुमार के घर में घुसकर गोलीबारी की। फायरिंग (Firing) में पवन कुमार की मौत हो गई जबकि उनके भाई अशोक कुमार घायल हुए थे। अदालत ने चारों को मृत्युदंड देने के साथ ₹170 का जुर्माना भी लगाया।
12 अगस्त को शाहनवाज को मौत की सजा सुनाई गई। मामला करीब 27 साल पुराना था। आरोप था कि 1999 में लकड़ी कारोबारी सलीम का ₹5 लाख की फिरौती के लिए अपहरण किया गया। इसके बाद 9 दिसंबर 1999 को छपार क्षेत्र के जंगल में सलीम की गला रेतकर हत्या कर दी गई। करीब ढाई दशक बाद इस मामले में अदालत ने शाहनवाज को मृत्युदंड सुनाया।
17 जुलाई को 2011 के किसान हत्याकांड में चार आरोपियों को मौत की सजा दी गई। राज सिंह अपने दोस्त विजेंद्र के साथ मोटरसाइकिल से बहन के घर जा रहे थे। रास्ते में बदमाशों ने उन्हें रोक कर लूट की कोशिश की। राज सिंह ने विरोध किया तो उन्हें गोली मार दी गई। वहीं विजेंद्र को बांधकर गन्ने के खेत में फेंक दिया गया। इस मामले में अदालत ने चार दोषियों को मृत्युदंड दिया।
6 जुलाई को 2010 के एक हत्याकांड में पूर्व ग्राम प्रधान प्रमोद और उसके सहयोगी सहदेव को मौत की सजा सुनाई गई। मामला पंचायत चुनाव की रंजिश से जुड़ा था। 60 वर्षीय राजवीर सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जज दिवाकर ने मामले में दुर्लभतम मामलों में दुर्लभ (Rarest of Rare) श्रेणी को माना।
2 जुलाई को भी अदालत से मौत की सजा का फैसला आया। मामला था होमगार्ड रतिराम की हत्या का। आरोप के मुताबिक दीपक अपनी मां के साथ मारपीट कर रहा था। रतिराम ड्यूटी (Duty) पर थे और बीच बचाव करने पहुंचे। इसी दौरान उन पर चाकू से हमला किया गया और उनकी मौत हो गई।
अदालत ने आरोपी दीपक को मौत की सजा सुनाई और इसे भी दुर्लभतम मामलों में दुर्लभ (Rarest of Rare) माना। इसके बाद 20 जून को गजेंद्र और रामकिशन को राजेंद्र सैनी की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई। अदालत ने माना कि मामला दुर्लभम श्रेणी में आता है और अधिकतम दंड उचित है।
30 जुलाई को करीब 15 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में 50 वर्षीय रईस को मौत की सजा सुनाई गई। मामला 2011 का था। राजेश देवी और उसके छ साल के बेटे हिमांशु की हत्या का आरोप था। दोनों को गन्ने की खेत में ले जाकर ईंटों से हमला किया गया था। दोनों के शव कई दिन बाद बरामद हुए।
28 अप्रैल को 2019 के एक हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों यानी कुल चार लोगों को मृत्युदंड दिया गया। एक ही मामले में परिवार के चार लोगों को मौत की सजा मिलने से यह भी फैसला काफी चर्चा में रहा।
इसके बाद 6 अप्रैल को 2019 में अधिवक्ता मोहम्मद समीर के अपहरण और हत्या के मामले में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। अभियोजन के मुताबिक करीब ₹45 लाख के लेनदेन विवाद को लेकर समीर का अपहरण किया गया था। बाद में उनकी हत्या कर शव को दूसरी जगह फेंक दिया गया। जांच के बाद शव सिकरी गांव के जंगल क्षेत्र से बरामद किया गया।
आपको बता दें कि रवि कुमार दिवाकर 46 साल के हैं और वह लखनऊ के रहने वाले हैं। उन्होंने बीकॉम (B.Com) और एलएलएम (LLM) की पढ़ाई की है। साल 2009 में आजमगढ़ से अतिरिक्त सिविल जज के तौर पर न्यायिक करियर शुरू किया। इसके बाद मई 2015 में सुल्तानपुर में सिविल जज बने। करीब 5 महीने बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर पहुंचे और नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर कार्यरत हैं।
पहली बार आश्रय सर पर तब चर्चा में आए थे जब 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे (Videography Survey) का आदेश उनके द्वारा दिया गया था। इसके बाद वह लगातार देश भर में सुर्खियों में रहे। और अब 22 मृत्युदंड (Death Sentence) ने उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इसे लेकर जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के मुताबिक लगातार मृत्युदंड के फैसलों के बाद कई वकीलों और मुकदमों से जुड़े पक्षकारों के बीच आशंकाएं बनने लगी थी। उनका कहना था कि लोगों में यह धारणा बनने लगी है कि ऐसे मामलों में मृत्युदंड दिए जाने की संभावना ज्यादा हो सकती है। इसी पृष्ठभूमि में जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने प्रशासनिक आदेश जारी कर संबंधित मामलों को अपनी अदालत में वापस बुला लिया।
यह समझना जरूरी है कि ट्रायल कोर्ट (Trial Court) द्वारा मौत की सजा सुनाया जाना अंतिम कदम नहीं है। मृत्युदंड के मामले में हाई कोर्ट (High Court) की पुष्टि जरूरी होती है। यानी किसी आरोपी को ट्रायल कोर्ट से मृत्युदंड (Death Sentence) मिलने के बाद भी आगे न्यायिक प्रक्रिया मौजूद रहती है। इसलिए इन फैसलों को सीधे अंतिम फांसी के आदेश के तौर पर देखना सही नहीं होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला है या फिर लगातार मृत्युदंड के फैसलों के बाद पैदा हुई कानूनी हलचल ने इस ट्रांसफर (Transfer) को चर्चा में ला दिया है। फिलहाल न्यायपालिका की ओर से इस फैसले पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।