भारत में E20 Petrol (Gasoline) (20% Ethanol + 80% Petrol) को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण में कमी आएगी। लेकिन दूसरी ओर सोशल मीडिया और कई विशेषज्ञों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या Ethanol Blending वास्तव में गाड़ियों के लिए सुरक्षित है या इससे इंजन की उम्र पर असर पड़ सकता है? आइए समझते हैं कि Ethanol क्या है, E20 Petrol (Gasoline) कैसे काम करता है और इसके पीछे की साइंस क्या कहती है।
E20 Petrol (Gasoline) क्या है और Ethanol कैसे बनता है?
Ethanol एक कार्बनिक रासायनिक यौगिक ( Organic Chemical Compound ) है, जिसका रासायनिक सूत्र C₂H₅OH होता है। इसे मुख्य रूप से गन्ने के शीरे (Molasses), मक्का, चावल और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका OH (Hydroxyl Group) है, जो इसे सामान्य Petrol (Gasoline) से अलग बनाता है। यही कारण है कि Ethanol की रासायनिक विशेषताएं Petrol (Gasoline) से काफी अलग होती हैं।
E20 Petrol (Gasoline) का मतलब है कि इसमें 20 प्रतिशत Ethanol और 80 प्रतिशत Petrol मिलाया गया है। भारत सरकार लंबे समय से Ethanol Blending Programme को बढ़ावा दे रही है ताकि Petrol (Gasoline) की खपत कम हो और घरेलू ईंधन उत्पादन को बढ़ावा मिले।
Ethanol बनाने की प्रक्रिया
यही प्रक्रिया (Process) हजारों सालों से शराब बनाने में भी इस्तेमाल होती रही। किण्वन ( Fermentation ) से जो एथेनॉल ( Ethanol ) मिलता है वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता। उसमें काफी मात्रा में पानी होता है। एथेनॉल ( Ethanol ) और पानी मिलकर समक्वथी मिश्रण ( Azeotrope ) बना लेते हैं। समक्वथी मिश्रण ( Azeotrope ) एक ऐसा मिक्सचर जिसे आसानी से अलग नहीं किया जा सकता। आसवन ( Distillation ) से लगभग 95% तक शुद्ध एथेनॉल ( Ethanol ) मिल जाता है। उससे ज्यादा नहीं। इसलिए उसके बाद दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।
जैसे आणविक छलनी ( Molecular Sieves ),दाब-परिवर्तन तकनीक ( Pressure Swing ), अधिशोषण ( Adsorption ) या निर्जलीकरण (Dehydration)। इसके बाद लगभग 99.5% शुद्ध फ्यूल ग्रेड (Fuel Grade) एथेनॉल ( Ethanol ) तैयार हो जाता है। यही एथेनॉल ( Ethanol ) बाद में Petrol (Gasoline) में मिलाया जाता है।
भारत में Ethanol किन फसलों से बनाया जाता है?
भारत में सबसे ज्यादा एथेनॉल ( Ethanol ) गन्ने से बनने वाले मोलासिस ( Molasses )यानी शीरे से बनाया जाता है। पहले सिर्फ सी मोलालसिस का इस्तेमाल होता था लेकिन अब बी हैवी मोलासिस ( Molasses )और सीधे शुगरकेन जूस से भी एथेनॉल ( Ethanol ) बनाया जा रहा है। सी मोलासिस ( Molasses )और बी हैवी मोलाइससिस दोनों ही शीरे हैं। फर्क बस इतना है कि बी हैवी मोलासिस ( Molasses )में शुगर की मात्रा थोड़ी ज्यादा होती है।
Ethanol बनाने में कितना पानी लगता है?
मुलासिस के अलावा सरकार ने मक्का, चावल और दूसरे अनाजों से भी एथेनॉल ( Ethanol ) बनाने की अनुमति दे दी है। एथेनॉल ( Ethanol ) जिन भी फसलों से बनता है उन्हें उगाने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। सबसे ज्यादा पानी गन्ने और चावल की खेती में लगता है। अगर पूरे जल पदचिह्न (Water Footprint) को देखा जाए या फसल उगाने से लेकर आसवनी (Distillery) में एथेनॉल ( Ethanol ) तैयार होने तक तो 1 लीटर एथेनॉल ( Ethanol ) के पीछे औसतन लगभग 2000 से 10,000 लीटर तक पानी की खपत होती है। मक्का आधारित एथेनॉल ( Ethanol ) का जल पदचिह्न (Water Footprint) कम होता है, लेकिन वह भी हजारों लीटर प्रति लीटर एथेनॉल ( Ethanol ) तक पहुंच जाता है।
सरकार E20 Petrol को क्यों बढ़ावा दे रही है?
एथेनॉल ( Ethanol ) मिश्रण ( Blending ) प्रोग्राम को पुश करने के पीछे सरकार की तरफ से सबसे बड़ा तर्क दिया जाता है कि यह Petrol (Gasoline) से सस्ता है और इससे गाड़ियों में भी कोई दिक्कत नहीं होती। 60% इथेनॉल 40% बिजली उसका अगर एवरेज पकड़ा जाएगा तो ₹15 लीटर Petrol (Gasoline) का भाव होगा। जनता का भला होगा। किसान ऊर्जा दाता बनेगा। Petrol (Gasoline) से सस्ता तो सिर्फ सरकार के लिए है। तो उस पर बात करने का कोई तुक बनता नहीं है।
क्या E20 Petrol इंजन के लिए नुकसानदायक है?
अब रही बात गाड़ियों में दिक्कत की। तो आपने कई न्यूज़ सुने होंगे कि किसी की गाड़ी का इंजन खराब हो गया एथेनॉल ( Ethanol ) की वजह से। किसी के इंजन में चौकिंग की समस्या आ रही है। किसी की गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही। लेकिन ये समस्याएं तो बाद की हैं। एथेनॉल ( Ethanol ) गाड़ी में डलते ही दिक्कत शुरू कर देता है। Ethanol एक Hygroscopic Compound (आर्द्रताग्राही यौगिक) है। आर्द्रताग्राही ( Hygroscopic ) उस कंपाउंड ( Compound ) को कहते हैं जो पानी को अट्रैक्ट करता है और एथेनॉल ( Ethanol ) में ये खासियत पाई जाती है। यानी एथेनॉल ( Ethanol ) हवा में मौजूद नमी जलवाष्प (Water Vapour) को अपनी तरफ खींच लेता है। ऐसा होता क्यों है? इसका जवाब एथेनॉल ( Ethanol ) के OH यानी हाइड्रॉक्सिल समूह ( Hydroxyl Group ) में छिपा है। हाइड्रॉक्सिल समूह ( Hydroxyl Group ) में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के बीच बनने वाला OH बॉन्ड एक ध्रुवीय सहसंयोजक बंध (Polar Covalent Bond) है। ऑक्सीजन हाइड्रोजन की तुलना में इलेक्ट्रॉन्स को ज्यादा ताकत से अपनी तरफ खींचती है। इसलिए ऑक्सीजन पर हल्का सा नेगेटिव चार्ज पार्शियल नेगेटिव चार्ज और हाइड्रोजन पर हल्का पॉजिटिव चार्ज यानी कि पार्शियल पॉजिटिव चार्ज आ जाता है। अब पानी के मॉलिक्यूल को देखिए। पानी में भी हाइड्रोजन ऑक्सीजन होती है। यानी ये भी एथेनॉल ( Ethanol ) की तरह पोलर मॉलिक्यूल है। इसमें भी ऑक्सीजन पर हल्का नेगेटिव और हाइड्रोजन पर हल्का पॉजिटिव चार्ज होता है। केमिस्ट्री का एक मूल सिद्धांत है बेसिक प्रिंसिपल "Like Dissolves Like" (समान पदार्थ समान में घुलते हैं) जब पोलर मॉलिक्यूल्स एक दूसरे के पास आते हैं तो उनके बीच हाइड्रोजन बॉन्ड बनने लगता है। इसी वजह से एथेनॉल ( Ethanol ) हवा में मौजूद नमी को धीरे-धीरे अपनी तरफ खींच लेता है।
अगर गाड़ी रोज चल रही है और टैंक में फ्यूल ज्यादा समय तक नहीं रुकता तो आमतौर पर यह समस्या सीमित रहती है। लेकिन अगर गाड़ी कई हफ्तों या महीनों तक खड़ी रहे तो एथेनॉल ( Ethanol ) धीरे-धीरे पानी की मात्रा बढ़ जाती है।शुरुआत में थोड़ा बहुत पानी एथेनॉल ( Ethanol ) के साथ घुला रहता है। लेकिन जब पानी की मात्रा एक सीमा से ज्यादा हो जाती है तो एथेनॉल ( Ethanol ) और पानी मिलकर Petrol (Gasoline) से अलग होने लगते हैं। सेपरेशन हो जाता है क्योंकि Petrol (Gasoline) पानी में घुलता नहीं। नतीजा यह होता है कि टैंक के ऊपर Petrol (Gasoline) की परत रह जाती है। नीचे एथेनॉल ( Ethanol ) और पानी की परत जमा हो जाती है। फ्यूल पंप हमेशा टैंक के निचले हिस्से से फ्यूल खींचता है। अगर नीचे पानी और एथेनॉल ( Ethanol ) की परत जमा हो गई तो वो मिक्सचर सबसे पहले इंजन तक पहुंचेगा। पानी जलता नहीं है। इसलिए इंजन स्टार्ट होने में परेशानी, मिसफायर या खराब रनिंग जैसी समस्याएं पैदा हो जाएंगी। साथ ही पानी लंबे समय तक मेटल के संपर्क में रहे तो जंग की संभावना भी बढ़ जाती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। एथेनॉल ( Ethanol ) के साथ कई और भी समस्याएं हैं। एथेनॉल ( Ethanol ) एक अच्छा सॉल्वेंट है। सॉल्वेंट यानी ऐसा पदार्थ जो दूसरी चीजों को घोल सकता है। पुरानी गाड़ियों के टैंक और पाइप्स में सालों तक Petrol (Gasoline) चलने से अंदर हल्की-हल्की वार्निश, गम और कार्बन डिपॉजिट्स जमा हो जाते हैं। Petrol (Gasoline) इन्हें नहीं घोलता। लेकिन एथेनॉल ( Ethanol ) इन जमावों को धीरे-धीरे ढीला कर देता है। जब ये परतें टूटती हैं तो उनके छोटे-छोटे कण फ्यूल लाइन के साथ बहते हुए फ्यूल फिल्टर और फ्यूल इंजेक्टर तक पहुंच जाते हैं और इंजेक्टर चोक हो जाता है। एथेनॉल ( Ethanol ) की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा Petrol (Gasoline) से अधिक होती है।इसका मतलब यह है कि लिक्विड से गैस बनने के लिए इसे ज्यादा गर्मी चाहिए। ठंडे मौसम में एथेनॉल ( Ethanol ) का वेपराइजेशन Petrol (Gasoline) के मुकाबले कठिन होते है। इसलिए गाड़ियों में कोल्ड स्टार्ट की समस्या भी आ जाती है। चलिए गाड़ियां खराब हो रही हैं।
क्या Ethanol वास्तव में Environment Friendly Fuel है?
सरकार की ये बात है एथेनॉल ( Ethanol ) फ्यूल एनवायरमेंट फ्रेंडली है। कम से कम हम एनवायरमेंट को तो बचा रहे हैं। लेकिन इसका जवाब है नहीं। एथेनॉल ( Ethanol ) एनवायरनमेंट फ्रेंडली नहीं है। यह समझिए कैसे? किसी भी फ्यूल का एनवायरमेंट फ्रेंडली होना उसके मॉलिक्यूल से तय होता है। यानी राज केमिस्ट्री में छिपा है। किसी भी फ्यूल को हम तब एनवायरमेंट फ्रेंडली कहते हैं जब उसका एमिशन जीरो या बहुत कम हो। एमिशन जानने के लिए हमें उस फ्यूल का मोलर मास पता होना चाहिए। अब हम इथेनॉल को Petrol (Gasoline) से कंपेयर कर रहे हैं। तो पहले Petrol (Gasoline) की केमिस्ट्री देख लेते हैं। Petrol (Gasoline) का एक फिक्स फार्मूला नहीं है। यह अलग-अलग हाइड्रोकार्बंस का मिक्सचर है। इसमें दर्जनों तरह के कार्बनिक कंपाउंड ( Compound ) हो सकते हैं। हेप्टेन, ऑक्टेन, आइसोऑक्टेन, टोल्यून (Toluene) , ज़ाइलीन (Xylene) जैसे कई सारे। अलग-अलग तेल शोधनशालाएँ (Refineries) और अलग-अलग देशों में इनका अनुपात अलग-अलग हो सकता है। लेकिन एक बात सभी में कॉमन रहती है, समान रहती है। Petrol (Gasoline) लगभग पूरी तरह कार्बन और हाइड्रोजन से बना होता है। तुलना के लिए पूरे मिक्सचर के बजाय प्रमुख अणु (Primary Molecule) आइसो ऑक्टेन का इस्तेमाल करते हैं। इसकी वजह यह है कि इसकी विशेषताएं Petrol (Gasoline) के सिमिलर होती हैं। ऊपर से यह Petrol (Gasoline) में प्रमुख अणु (Primary Molecule) भी हैं। इसलिए अधिकतर केमिकल कैलकुलेशन आइसोऑक्टेन पर ही आधारित होती है। जब भी आप Petrol (Gasoline) को लेकर कोई एनालिसिस करना चाहें। आइसो ऑक्टेन का फार्मूला होता है C8H18। कार्बन के एक एटम का मोलर मास 12 ग्राम प्रति मोल होता है। इस हिसाब से आठ कार्बन एटम्स का मास हुआ 8 * 12 = 96। हाइड्रोजन के एक एटम का मोलर मास होता है 1 ग्राम पर मोल। तो 18 हाइड्रोजन एटम्स का मास हुआ 18 * 1 यानी कि 18 ग्राम पर मोल। यानी कुल मोलर मास हुआ 114 ग्राम पर मोल। अब अगर इसका एटॉमिक कंपोजशन बाय मास निकालें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कुल 114 ग्राम में से 96 ग्राम कार्बन यानी लगभग 84% जबकि 18 ग्राम हाइड्रोजन यानी 16 फीसदी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Petrol (Gasoline) में हाइड्रोजन और कार्बन के अलावा तीसरा कोई तत्व (Element) नहीं होता। ना ही ऑक्सीजन और ना ही कोई अन्य तत्व (Element)। इसका मतलब यह है कि Petrol (Gasoline) का लगभग पूरा मास सिर्फ कार्बन और हाइड्रोजन से बना होता है।
Petrol बनाम Ethanol: Carbon और Energy Density
अब इसकी तुलना एथेनॉल ( Ethanol ) से कीजिए। एथेनॉल ( Ethanol ) में तीन तत्व (Element)्स हैं। कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन। कार्बन के दो एटम, एक एटम का मोलर मास 12 ग्र. प्रति मोल का, दो का हो गया 24। हाइड्रोजन के छह एटम, एक एटम का मास 1 ग्र. पर मोल, छह हाइड्रोजन का हुआ 6 ग्राम पर मोल। ऑक्सीजन का मोलर मास 16 ग्राम प्रति मोल। यानी कुल मिलाकर एथेनॉल ( Ethanol ) का मोलर मास हो गया 24 + 6 + 16, 46 ग्राम प्रति मोल। इस हिसाब से एथेनॉल ( Ethanol ) में 52% कार्बन, करीब 13% हिस्सा हाइड्रोजन और लगभग 35% हिस्सा ऑक्सीजन होती है। यानी एथेनॉल ( Ethanol ) अपने अंदर पहले से ही ऑक्सीजन लेकर चलता है। इसी ऑक्सीजन की वजह से इसके जलने की प्रोसेस Petrol (Gasoline) से अलग होती है। इसे जलने के लिए बाहर से कम ऑक्सीजन चाहिए और जलने के बाद यह कम ही कार्बन उत्पाद (Products) बनाता है। कार्बन प्रतिशत के हिसाब से एथेनॉल ( Ethanol ) Petrol (Gasoline) के मुकाबले करीब 38% कम पोलशन करता है। लेकिन इसी आधार पर इसे ग्रीन फ्यूल या एनवायरमेंट फ्रेंडली फ्यूल नहीं कहा जा सकता। इसमें एक पेंच है। Petrol (Gasoline) के प्रमुख अणु (Primary Molecule) आइसो ऑक्टेन में कार्बन 84% था और एथेनॉल ( Ethanol ) में कार्बन 52%। यानी Petrol (Gasoline) में कार्बन की मात्रा एथेनॉल ( Ethanol ) से लगभग डेढ़ गुना ज्यादा है। किसी भी हाइड्रोकार्बन फ्यूल की सबसे बड़ी ऊर्जा उसके कार्बन हाइड्रोजन बॉन्ड्स में छिपी होती है। जितना ज्यादा कार्बन और हाइड्रोजन होगा उतनी ज्यादा केमिकल एनर्जी स्टोर होगी। जब Petrol (Gasoline) इंजन में स्पार्क पड़ता है तो Petrol (Gasoline) हवा में मौजूद ऑक्सीजन के साथ रिएक्शन करता है। इसे दहन ( Combustion ) कहते हैं। आइसोऑक्टेन का बैलेंस्ड केमिकल इक्वेशन कुछ इस तरह लिखा जाता है। यानी दो मॉलिक्यूल्स आइसो ऑक्टेन जलने के लिए बाहर की हवा से 25 ऑक्सीजन मॉलिक्यूल्स लेते हैं और बदले में कार्बन डाइऑक्साइड, वाटर वेपर और बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा करते हैं। यही ऊर्जा पिस्टन को नीचे धकेलती है और आपकी गाड़ी चलती है। जब एथेनॉल ( Ethanol ) का दहन ( Combustion ) होता है तो ये वाली रिएक्शन होती है।
Energy Density कम होने का क्या असर पड़ता है?
एथेनॉल ( Ethanol ) को जलने के लिए बाहर से ऑक्सीजन तो चाहिए लेकिन Petrol (Gasoline) की तुलना में कम चाहिए क्योंकि ऑक्सीजन इसके पास पहले से है। एथेनॉल ( Ethanol ) में कार्बन कम है। इसलिए प्रति लीटर जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड भी कम बनती है। लेकिन कार्बन कम है तो एनर्जी भी कम बनेगी। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) में हर एक फ्यूल का दहन ऊष्मा (Heat of Combustion) होता है। यानी उसे पूरी तरह जलाने पर कितनी ऊर्जा निकलती है? Petrol (Gasoline) की एनर्जी डेंसिटी लगभग 43 44 मेगाजूल पर किलोग्राम होती है। अगर लीटर के हिसाब से देखें तो लगभग 32 मेगाजूल प्रति लीटर ऊर्जा मिलती है। दूसरी तरफ एथेनॉल ( Ethanol ) की एनर्जी डेंसिटी लगभग 26 27 मेगाजूल/ किलोग्राम लीटर में करीब 21 मेगाजूल प्रति लीटर के आसपास होती है। यानी अगर दोनों के एक-ए लीटर को जलाया जाए तो एथेनॉल ( Ethanol ) लगभग 30 से 35% कम ऊर्जा देगा। यही एथेनॉल ( Ethanol ) Petrol (Gasoline) के मुकाबले करीब 38% कम पोलशन कर रहा था। लेकिन 30 से 35% कम ऊर्जा भी दे रहा है। यानी हमें Petrol (Gasoline) के बराबर ऊर्जा पाने के लिए 30 से 35% अधिक एथेनॉल ( Ethanol ) इस्तेमाल करना होगा जो और पोलशन बढ़ाएगा। इस हिसाब से एथेनॉल ( Ethanol ) और Petrol (Gasoline) का पोलशन अंतर नेगलिजिबल है। यानी एनवायरमेंट फ्रेंडली फ्यूल के नाम पर तो इसे नहीं बेचा जा सकता।
Racing Cars में Ethanol क्यों इस्तेमाल होता है?
एथेनॉल ( Ethanol ) को डिफेंड करते हुए आपने सरकार की तरफ से एक बात सुनी होगी। अगर एथेनॉल ( Ethanol ) इतना खराब फ्यूल होता तो दुनिया की रेसिंग कारें इसे इस्तेमाल क्यों करती? पहली बार सुनने में ये जवाब लॉजिकल लग सकता है कि जब रेसिंग कारें एथेनॉल ( Ethanol ) पर दौड़ती हैं तो फिर आम गाड़ियों में समस्या क्यों होगी? लेकिन यह जवाब है, लॉजिकल नहीं है। रेसिंग कार्स में एथेनॉल ( Ethanol ) इस्तेमाल में इसलिए लिया जाता है क्योंकि इसका ऑक्टेन नंबर ज्यादा होता है। ऑक्टेन नंबर ज्यादा होने का मतलब यह नहीं कि फ्यूल ज्यादा ताकतवर है।
Octane Number क्या होता है?
ऑक्टेन नंबर बताता है कि कोई फ्यूल नॉकिंग का कितना विरोध कर सकता है। नॉकिंग क्या है वो समझिए। जब इंजन में पिस्टन ऊपर जाकर हवा और फ्यूल के मिक्सचर को दबाता है तो आइडियल स्टेट में मिक्सचर तभी जलना चाहिए जब स्पार्क क्लर्क चिंगारी दे। लेकिन अगर मिक्सचर स्पार्क से पहले खुद ही जल जाए तो सिलेंडर के अंदर छोटे-छोटे धमाके होने लगते हैं। इसे नॉकिंग कहा जाता है। जिस फ्यूल का ऑक्टेन नंबर जितना ज्यादा होगा वो उतना ही अधिक कंप्रेशन सह सकेगा और उतनी ही देर तक अपने आप नहीं जलेगा। मतलब ऑटोमेटिक स्पार्क जो है वो नहीं होगा। Petrol (Gasoline) का ऑक्टेन नंबर आमतौर पर 91 से 95 के बीच होता है। जबकि एथेनॉल ( Ethanol ) का लगभग 108 109 तक हो सकता है। यानी एथेनॉल ( Ethanol ) बहुत अधिक कंप्रेशन सह सकता है। एथेनॉल ( Ethanol ) कम ऊर्जा देता है। लेकिन उसे ज्यादा कंप्रेशन देकर उस कमी की कुछ भरपाई की जा सकती है और यही काम रेसिंग इंजंस करते हैं। लेकिन इतना ज्यादा कंप्रेशन नॉर्मल गाड़ियों में पॉसिबल नहीं है। रेसिंग कार के इंजन को इसी हिसाब से डिजाइन किया जाता है। उसका फ्यूल टैंक अलग होता है। फ्यूल पंप अलग होता है। फ्यूल इंजेक्टर अलग होता है। फ्यूल प्रेशर अलग होता है। फ्यूल लाइन अलग होती है। रबड़ सील्स अलग मटेरियल के होते हैं। इंजन कंट्रोल यूनिट यानी कि ईसीयू पूरी तरह उसी फ्यूल के हिसाब से प्रोग्राम्ड होती है। इग्निशन टाइमिंग भी अलग होती है। कंप्रेशन रेशियो भी अलग होता है। कूलिंग सिस्टम भी सामान्य गाड़ियों से कहीं अधिक पावरफुल होता है। यानी वहां सिर्फ फ्यूल नहीं बदला गया होता। पूरा इंजन ही बदल गया होता है। अब इसकी तुलना नॉर्मल कार से कर लीजिए। आपकी कार को सिर्फ तेज नहीं चलाना। उसे गर्मी में भी चलना है। सर्दी में भी ट्रैफिक में घंटों रेंगना भी है। 10-15 सालों तक चलना है। उसे कम मेंटेनेंस में लाखों किलोमीटर निकालने हैं। उसकी फ्यूल इकॉनमी भी अच्छी होनी चाहिए और सर्विस भी सस्ती।
सबसे बड़ी बात रेसिंग कार का फ्यूल कभी भी महीनों तक टैंक में नहीं पड़ा रहता। हर रेस से पहले नया फ्यूल डाला जाता है। रेस खत्म हुई फ्यूल निकाल दिया जाता है। मेंटेनेंस शुरू कर दी जाती है। कई रेसिंग इंजंस को तो कुछ 100 कि.मी. चलने के बाद ही दोबारा रिबिल्ड किया जाता है। इस हिसाब से रेसिंग कार का कंपैरिजन आम कार से करना स्टुपिडिटी है। बेवकूफी है। लेकिन उसका तो जलवा है। एथेनॉल ( Ethanol ) मिश्रण ( Blending ) को लेकर सरकार के अपने तर्क हैं। सरकार कहती है कि इससे विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी। किसानों को फायदा मिलेगा। आयात का बिल घटेगा और प्रदूषण भी कम होगा। गाड़ी को नुकसान भी नहीं होगा। दूसरी तरफ साइंस अलग कहानी बयान करती है। उम्मीद है वीडियो से आपको समझ आ गया होगा कि एथेनॉल ( Ethanol ) आखिर है क्या? यह कैसे बनता है? इसके पीछे की केमिस्ट्री क्या है और इसे लेकर इतने सवाल क्यों उठते हैं? अब फैसला आपका है कि सरकारों के दावों पर और वैज्ञानिक तथ्यों को देखकर आप किस नतीजे पर पहुंचते हैं