AI की दुनिया में जितना पैसा लग रहा है उसका असर सिर्फ टेक कंपनियों पर नहीं पड़ रहा है। इसका असर अब आम लोगों की जेब तक पहुंच सकता है। भारतीय टेक कंपनी जोहो के फाउंडर श्रीधर बंबू ने बड़ी चेतावनी दे दी है। उन्होंने AI की मौजूदा रेस को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि दुनिया में AI और डाटा सेंटर्स पर जितना बड़ा खर्च हो रहा है, इसका असर मेमोरी चिप्स की कीमतों पर पड़ रहा है।
यही वजह है कि फोन, लैपटॉप और दूसरे गैजेट्स महंगे हो रहे हैं। पूरा मामला क्या है? इस वीडियो में हम आपको बताने जा रहे हैं।
AI को लेकर पूरी दुनिया में बड़ी रेस चल रही है। OpenAI, Google, Microsoft, Meta और दूसरी बड़ी कंपनियां तेजी से AI मॉडल और डाटा सेंटर्स बना रही हैं। इन सबको चलाने के लिए भारी मात्रा में चिप्स, जीपीयू, सर्वर और मेमोरी की जरूरत होती है।
श्रीधर बंबू ने हाल ही में मेमोरी की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता जताई है। उनके मुताबिक एक वक्त था जब सॉफ्टवेयर बनाने वाली दुनिया मेमोरी को लगभग सस्ता और आसानी से मिलने वाला रिसोर्स मानती थी। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।
बंबू ने कहा कि मेमोरी और AI टोकन की बढ़ती कीमतों ने बिजनेस चलाने को मुश्किल कर दिया है। AI मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए बड़ी मात्रा में खास तरह की मेमोरी चाहिए। बड़ी चिप कंपनियां अब AI डाटा सेंटर्स के लिए इस्तेमाल होने वाली हाई बैंडविड्थ मेमोरी पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। इसमें ज्यादा कमाई है।
लेकिन इसका असर यह है कि फोन और लैपटॉप में इस्तेमाल होने वाली सामान्य मेमोरी की सप्लाई पर दबाव पड़ सकता है। टेक इंडस्ट्री में इसे लेकर चिंता पहले से ही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक AI सेंटर्स की बढ़ती मांग ने रैम और स्टोरेज चिप्स की सप्लाई पर दबाव बनाया है। इसका असर स्मार्टफोन, पीसी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस की कीमतों पर पड़ रहा है।
एक साल में 500% तक महंगी हो चुकी है मेमोरी चिप्स। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ DDR5 मेमोरी किट्स की कीमत में पिछले 12 महीनों के दौरान भारी उछाल देखने को मिला है। कुछ मामलों में कीमतें कई गुना बढ़ी हैं।
यही कारण है कि बंबू ने कहा है कि मेमोरी अब पहले की तरह हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। सॉफ्टवेयर और AI सेंटर्स को भी अब मेमोरी की बेहतर तरीके से काम कराने लायक बनाना होगा।
अब बात करते हैं फोन और लैपटॉप महंगे क्यों हो रहे हैं? अगर आपके फोन में रैम है, स्टोरेज है, प्रोसेसर है, आपके लैपटॉप में भी यही चीजें हैं। अगर इसमें इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स महंगे होते हैं, तो कंपनियों के लिए पुरानी कीमत पर नया डिवाइस बेचना मुश्किल हो सकता है।
कुछ कंपनियां शुरुआत में बढ़ी हुई लागत को खुद सहन करती हैं। लेकिन लागत लगातार बढ़ती रही तो इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक भी पहुंच सकता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक AI कंपनियां एक बड़े हाई स्केलर को बनाने वाले सालों के लिए मेमोरी सप्लाई लॉक करने की कोशिश कर रही हैं। इससे पीसी और फोन बनाने वाली कंपनियों को कम सप्लाई के लिए मुकाबला करना पड़ सकता है।
श्रीधर बंबू पहले AI के असर को लेकर एक और बड़ी चिंता जता चुके हैं। उन्होंने कहा है कि IT कंपनियां पहले जितनी नई नौकरियां नहीं बना पा रही हैं। उनके मुताबिक जो पैसा पहले नए कर्मचारियों को रखने में जा सकता था, उसका हिस्सा अब AI और डाटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है।
अब उनकी नई चिंता मेमोरी और कंप्यूटिंग की बढ़ती लागत है। यानी AI की रेस का असर कई जगह साफ दिख रहा है। कहीं नौकरियों पर सवाल उठ रहे हैं। कहीं कंपनियों का खर्च बढ़ रहा है और अब इसका असर आम लोगों के फोन और लैपटॉप की कीमत पर भी पड़ सकता है।