E20 Petrol को लेकर विशेषज्ञों ने सरकार की एथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे सिर्फ गाड़ियों पर नहीं बल्कि खेती, पानी और खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने E20 की जगह E10 ईंधन लागू करने और एथेनॉल वाले पेट्रोल की कीमत कम करने की मांग की है। पेट्रोल में 20% तक एथेनॉल मिलाने की नीति को लेकर दिल्ली में चर्चा हुई।
10 अगस्त को Indian Women’s Press Corps (IWPC) में हुए इस कार्यक्रम में एथेनॉल नीति के फायदे और नुकसान पर बात हुई। कार्यक्रम में दिल्ली विज्ञान मंच के वैज्ञानिक डॉ. रघुनंदन, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय (Ministry of Agriculture & Food Processing) के पूर्व सचिव सिराज हुसैन और नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद शामिल हुए।
डॉ. रघुनंदन ने कहा कि एथेनॉल की बढ़ती मांग से खेती का ध्यान भी बदल रहा है। पहले किसान ज्यादा से ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने पर ध्यान देते थे। लेकिन अब मक्का जैसी फसलों की मांग ईंधन बनाने के लिए बढ़ रही है। उन्होंने कहा है कि भारत पहले मक्का दूसरे देशों को बेचता था लेकिन अब अपनी जरूरत पूरी करने के लिए मक्का आयात कर रहा है।
रघुनंदन का कहना है कि अगर एथेनॉल के लिए फसलों की मांग लगातार बढ़ती रही तो इसका असर पानी और भूजल पर भी पड़ सकता है। नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद ने कहा है कि सरकार चावल और चीनी के अतिरिक्त स्टॉक को इस्तेमाल करने के लिए एथेनॉल का को बढ़ावा दे रही है। उनके मुताबिक धान की खेती में काफी पानी लगता है। ऐसे में कुछ इलाकों में धान की जगह कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है।
वहीं पूर्व सचिव सिराज हुसैन ने भारत की एथनॉल नीति की तुलना ब्राजील से करने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि दोनों देशों की आबादी, जमीन और खेती की परिस्थितियां अलग है। उन्होंने कहा है कि जलवायु परिवर्तन आने वाले समय में भारत की खेती को प्रभावित कर सकता है। इसलिए एथेनॉल नीति बनाते समय देश की खाद्य जरूरत और पानी की उपलब्धता का भी ध्यान रखना जरूरी है। विशेषज्ञों की सबसे बड़ी मांग E20 को लेकर है।
डॉ. रघुनंदन ने सरकार से E20 की जगह E10 ईंधन पर वापस लौटने की मांग की है। उनका दावा है कि E20 से कुछ गाड़ियों का माइलेज कम हो सकता है और रखरखाव का खर्च भी बढ़ सकता
है। ऐसे में आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार E20 जारी रखती है तो एथेनॉल वाले पेट्रोल की कीमत कम की जानी चाहिए।
E20 Petrol आपकी गाड़ी के साथ-साथ आपका बजट भी बिगाड़ सकता है। दरअसल पेट्रोल में सस्ता इथेनॉल मिलाने के बावजूद ना तो पेट्रोल सस्ता हुआ और अब जो हालात दिख रहे हैं उसमें उल्टा आपका रसोई का बजट ही, जिसमें खासकर चीनी, दूध, अंडे और चिकन शामिल है, यह सब महंगे होते जा रहे हैं।
आइए हम समझेंगे कैसे इथेनॉल बनाने की यह होड़ भारत में फूड इंफ्लेशन ( खाने-पीने की चीजों की महंगाई ) को जन्म दे रही है और आपकी जेब पर सबसे पहले पेट्रोल और फिर दूसरे खाने की चीजों के महंगे होने से दोहरा प्रहार कैसे पड़ेगा?
तो सबसे पहले इथेनॉल (Ethenol) का पूरा उत्पादन समझते हैं। इसमें इस्तेमाल होने वाली किन चीजों की वजह से आखिरकार महंगाई बढ़ रही है।
तो सबसे पहले इथेनॉल का सबसे बड़ा हिस्सा गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेस (B-Heavy Molasses) से बनाया जाता है। जब चीनी मिलों को गन्ने से मिलने वाली चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल (Ethenol) बनाने पर ज्यादा मुनाफा और सरकारी प्रोत्साहन मिलने लगा तो इसका ध्यान इथेनॉल उत्पादन पर केंद्रित हुआ।
इस परिस्थिति की वजह से चीनी के उत्पादन में गिरावट आई और बाजार में चीनी की कुल उपलब्धता भी इस साल पिछले साल की तुलना में करीब 5% कम है। इस स्थिति में बाज़ार में मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) काम करता है। ऐसे में बाजार में जब आपूर्ति कम हुई और मांग ज्यादा बढ़ी, चीनी के दाम इस साल काफी तेजी से बढ़े हैं।
पिछले 1 महीने को देख लीजिए तो पिछले 1 महीने के दौरान चीनी के दामों में 8 से 15% तक की तेजी आई है। दिल्ली में अभी ये कीमतें ₹50 प्रति किलो के आसपास जा पहुंची हैं।
एक और चीज बेहद जानने वाली है यहां पर कि इथेनॉल के उत्पादन में कुल 20% हिस्सा चीनी से आता है।
अब बात करते हैं आपके नाश्ते और खाने की यानी एग्स और चिकन के महंगाई की। तो दरअसल आप सोच रहे होंगे कि पेट्रोल में मिलने वाला एथेनॉल का मुर्गियों से या फिर अंडों से क्या कनेक्शन है। लेकिन यह संबंध बहुत महत्वपूर्ण है और इसी से Inflation (महंगाई ) का पूरा स्वरूप चलता है। यानी महंगाई इसी वजह से भी बढ़ती है।
जब सरकार ने गन्ने से इथेनॉल बनाने पर कुछ पाबंदियां लगाईं और इसको दूसरे उत्पाद में बदलाव किया तो ध्यान मोड़ा गया मक्के की तरफ ।
सरकार ने मक्के से इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरीज (Distilleries) को ज्यादा पैसे देने शुरू किए, जिससे शुगर पर यह प्रेशर कम हो सके। लेकिन इसका असर कुछ और हुआ।
दरअसल डिस्टलरीज और पोल्ट्री फार्म (मुर्गी पालन) के उद्योग के बीच मक्का खरीदने की होड़ मच गई। अभी तक मक्का का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मुर्गी पालन में होता था। लेकिन जब मक्का महंगा हुआ क्योंकि इनमें से कुछ हिस्सा इथेनॉल उत्पादन पर जाने लगा था, तो मुर्गियों को पालना और दाना खिलाने की लागत काफी बढ़ गई।
इसका नतीजा यह हुआ कि अंडे और चिकन के दाम आपकी मार्केट में बढ़ गए। ऐसे में आपने गौर किया होगा कि आजकल आपको ₹5 से ₹6 मिलने वाला अंडा फिलहाल ₹7 से ₹8 तक पहुंच चुका है।
ऐसे में यह चीज भी जानना बहुत जरूरी है कि इथेनॉल बनाने में मक्के का जो उत्पादन है, जो मक्के की हिस्सेदारी है, वो करीब 44% से ज्यादा है।
अब आते हैं दूसरे सबसे बड़े सवाल पर कि जब 20% पेट्रोल की जगह इथेनॉल मिलाया जा रहा है तो असल में पेट्रोल अभी तक सस्ता क्यों नहीं हुआ है?
तो उसके पीछे तीन अहम कारण बताए जाते हैं। इथेनॉल की कीमत सरकार ने ₹60 से ₹72 प्रति लीटर रखी है, जो कि रिफाइंड पेट्रोल के कीमत से भी ज्यादा है। यह इसके आधार मूल्य के आसपास रहती है। अगर कीमतें नॉर्मल रहे यानी $70 प्रति बैरल के आसपास रहे तो इसके आधार मूल्य के हिसाब से ही कीमत रहती है।
हालांकि आपको सस्ता पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल जरूर लग रहा होगा। जब आपने इसकी कीमत ₹60 से ₹72 सुनी होगी। लेकिन यहां पर जब आपके पास पेट्रोल पहुंचता है तो इसकी कीमत में शामिल हो जाता है टैक्स।
पेट्रोल पर मिलने वाले राहत का सबसे बड़ा हिस्सा केंद्र की एक्साइज ड्यूटी यानी राज्यों के VAT के तौर पर जाता है। यही सबसे ज्यादा हिस्सा है जिसकी वजह से पेट्रोल आपको महंगा मिलता है।
तो अगर आपका पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ है वो भी इथेनॉल की वजह से तो इसकी सबसे बड़ी वजह टैक्स है। सरकार भारी-भरकम टैक्स अभी पेट्रोल पर ले रही है।
लेकिन कुल मिलाकर अगर आप एक सामान्य उपयोगकर्ता हैं तो इथेनॉल नीति की वजह से अगर आपका पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ, गाड़ी का माइलेज भी अगर कुछ हद तक कम हो रहा है, लेकिन फिलहाल जो सबसे बड़ी कंडीशन आई है वो इनफ्लेशन की आई है। महंगाई बढ़ चुकी है। चीनी, अंडे, दूध और दूसरी कई चीजों के रेट्स बढ़ चुके हैं। क्योंकि इनकी उत्पादन लागत काफी ज्यादा बढ़ गई है।
अगर मेज और शुगर का ऐसे ही चलता रहा तो आगे आने वाले दिनों में चीनी उत्पादन जहां भारत में कम हुआ है तो रेट और ज्यादा बढ़ सकते हैं। इसका असर दूसरे कई चीजों में भी नजर आएगा।
Fast-moving consumer goods (FMCG) Product जैसे कि आपका पेय पदार्थ और दूसरे कई बिस्किट्स और कई उत्पादों में इस्तेमाल चीनी का होता है। वो सब भी महंगे हो जाएंगे।
क्योंकि कंपनियों पर जब इनपुट लागत ज्यादा पड़ेगी उनका उत्पादन ज्यादा महंगा हो जाएगा। जिससे अगर आप एक उपभोक्ता हैं तो आपको यह चीजें महंगी खरीदना पड़ेंगी।
तो कुल मिलाकर भारत के लिए अभी कंडीशन यह है कि इथेनॉल का उत्पादन फिलहाल के लिए इनफ्लेशन काफी बढ़ा सकता है।
हालांकि यह कंडीशन बहुत लंबे टाइम तक नहीं चलेगी। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त स्टॉक को ही इथेनॉल के उत्पादन पर लगाया जाए, जिससे इंफ्लेशन यानी महंगाई का असर आम जनता तक नहीं पहुंचे।
लेकिन फिलहाल की कंडीशन यह है कि चीनी का उत्पादन कम हुआ और इथेनॉल के उत्पादन की वजह से इसकी कीमतें काफी बढ़ गई हैं और इसका असर आपको आम मार्केट में नजर आएगा।